
Add to favoritesचर्चा में क्यों?
हाल ही में बायोफोर्टिफिकेशन ने लोकप्रिय भारतीय चावल किस्मों के बीच नाइट्रोजन उपयोग दक्षता में महत्त्वपूर्ण भिन्नता पाई है, जिससे उर्वरक लागत में कटौती और प्रदूषण को कम करने के लिये उच्च उत्पादकता वाली, कम नाइट्रोजन वाली किस्मों का विकास संभव हो पाया है। सबसे कुशल किस्मों की नाइट्रोजन उपयोग दक्षता (Nitrogen Use Efficiency- NUE) सबसे कम कुशल किस्मों की तुलना में पाँच गुना अधिक थी।
- एक अन्य घटनाक्रम में भारत के प्रधानमंत्री ने कृषि उत्पादकता और किसानों की आय बढ़ाने के लिये भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (Indian Council of Agricultural Research- ICAR) द्वारा विकसित 109 उच्च उत्पादकता वाली, जलवायु-अनुकूल, बायोफोर्टिफाइड बीज किस्मों को लॉन्च किया।
नाइट्रोजन उपयोग दक्षता (NUE) क्या है?
- परिचय:
- इसका उपयोग बायोमास उत्पादन के लिये प्रयुक्त या स्थिर नाइट्रोजन का उपयोग करने में संयंत्र की दक्षता का वर्णन करने हेतु किया जाता है।
- इसे फसल की उपज और जड़ों के माध्यम से मिट्टी से या बैक्टीरिया द्वारा स्थिरीकरण के माध्यम से, वातावरण से अवशोषित नाइट्रोजन की मात्रा के बीच के अनुपात के रूप में भी परिभाषित किया जाता है।
- अनाजों विशेषकर चावल में NUE, कृषि स्थिरता में एक महत्त्वपूर्ण कारक है।
- चिंताएँ:
- नाइट्रोजन उपयोग दक्षता अपर्याप्त होने के कारण भारत में प्रतिवर्ष 1 लाख करोड़ रुपए तथा विश्व स्तर पर प्रति वर्ष 170 बिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक मूल्य के नाइट्रोजन उर्वरक बर्बाद होते हैं।
- नाइट्रोजन उर्वरक वायु में नाइट्रस ऑक्साइड और अमोनिया प्रदूषण तथा जल में नाइट्रेट/अमोनियम प्रदूषण का मुख्य स्रोत हैं, जो हमारे स्वास्थ्य, जैव विविधता और जलवायु परिवर्तन को प्रभावित करते हैं।
- भारत विश्व में नाइट्रस ऑक्साइड (N2O) का दूसरा सबसे बड़ा स्रोत है, जो एक ग्रीनहाउस गैस है, जो कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में वायुमंडल को कहीं अधिक गर्म करती है।
- वर्ष 2020 में ऐसे वैश्विक मानव निर्मित उत्सर्जन का लगभग 11% भारत से था, जो चीन (16%) से दूसरे स्थान पर था। इन उत्सर्जनों का प्रमुख स्रोत उर्वरक का उपयोग है।
नाइट्रोजन प्रदूषण क्या है?
- परिचय:
- नाइट्रोजन प्रदूषण तब होता है जब अमोनिया और नाइट्रस ऑक्साइड जैसे कुछ नाइट्रोजन यौगिक पर्यावरण में अत्यधिक मात्रा में हो जाते हैं, जिससे स्वास्थ्य को खतरा पैदा हो जाता है।
- पिछले 150 वर्षों में मानव-चालित प्रतिक्रियाशील नाइट्रोजन का प्रवाह दस गुना बढ़ गया है, जिससे अप्रयुक्त प्रतिक्रियाशील नाइट्रोजन का खतरनाक संचयन हो रहा है।
- उर्वरक के रूप में नाइट्रोजन का फसलों द्वारा उपयोग सीमित है। प्रतिवर्ष 200 मिलियन टन प्रतिक्रियाशील नाइट्रोजन (80%) पर्यावरण में नष्ट हो जाता है, मिट्टी, नदियों और झीलों में रिस जाता है तथा हवा में उत्सर्जित होता है।
- परिणामस्वरूप पारिस्थितिकी तंत्र अत्यधिक समृद्ध हो जाता है, जैव विविधता नष्ट हो जाती है और मानव स्वास्थ्य प्रभावित होता है। कुछ रूपों में यह ओज़ोन क्षरण और जलवायु परिवर्तन में योगदान देता है।
- प्रभाव:
- जलवायु परिवर्तन और ओजोन परत:
- ग्रीनहाउस गैस के रूप में नाइट्रस ऑक्साइड मीथेन और कार्बन डाइऑक्साइड से 300 गुना अधिक शक्तिशाली है।
- यह ओज़ोन परत के लिये सबसे बड़ा मानव निर्मित खतरा भी है।
- जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र:
- नाइट्रोजन प्रदूषण मृदा को निम्नीकृत कर सकता है। सिंथेटिक उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग मिट्टी को अम्लीय बनाता है, जिससे मृदा का स्वास्थ्य निम्नीकृत होता है और मृदा की उत्पादकता कम होती है।
- इसके कारण वृक्षों और घास के मैदानों या नाइट्रोजन सहनशील प्रजातियों में अनजाने में निषेचन हो सकता है, जिससे अधिक संवेदनशील जंगली पौधे और कवक प्रतिस्पर्द्धा में पिछड़ सकते हैं।
- नाइट्रोजन प्रदूषण से समुद्र में “मृत क्षेत्र” बन सकते हैं और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र में विषाक्त शैवाल प्रस्फुटन फैल सकता है।
- वायु:
- कोयला विद्युत संयंत्रों से निकलने वाले उत्सर्जन और वाहनों से निकलने वाले धुएँ से उत्पन्न नाइट्रोजन ऑक्साइड तथा धुंध ज़मीनी स्तर पर ओज़ोन का कारण बन सकते हैं।
- कृषि से निकलने वाले अमोनिया उत्सर्जन और वाहनों से निकलने वाले प्रदूषण के कारण हवा में अत्यंत खतरनाक कण उत्पन्न होते हैं, जो श्वसन संबंधी बीमारियों को बढ़ा सकते हैं।
- जलवायु परिवर्तन और ओजोन परत:
ICAR द्वारा विकसित बायोफोर्टिफाइड बीज किस्में कौन-कौन सी हैं?
- परिचय: हाल ही में प्रधानमंत्री द्वारा लॉन्च की गई बायोफोर्टिफाइड बीज किस्मों में 61 फसलें शामिल हैं, जिनमें 34 खेत की फसलें और 27 बागवानी किस्में हैं।
- फसल किस्में: अनाज, बाजरा, चारा फसलें, तिलहन, दालें, गन्ना, कपास और रेशा फसलें।
- बागवानी: फल, सब्जियाँ, बागान फसलें, कंद, मसाले, फूल और औषधीय पौधे।
- कुछ उदाहरण:
- CR धान 416: यह चावल की किस्म तटीय लवणीय क्षेत्रों के लिये आदर्श है। यह भूरे धब्बे, नेक ब्लास्ट (Neck Blast), आच्छद विगलन (Sheath Rot), चावल टंग्रो रोग और ग्लूम विवर्णता के लिये मध्यम प्रतिरोधी है, इसके अलावा भूरा पौधा हॉपर, टिड्डा और स्टेम बोरर हेतु पूर्ण प्रतिरोध प्रदान करता है।
- ड्यूरम गेहूँ की किस्म: यह सिंचित परिस्थितियों के लिये अनुकूल है जो महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु के मैदानी इलाकों हेतु उपयुक्त है। यह टर्मिनल गर्मी के प्रति सहनशील है, तने और पत्ती के जंग के प्रति प्रतिरोधी है, और जिंक (41.1 पीपीएम) और आयरन (38.5 ppm) के उच्च स्तर के साथ बायोफोर्टिफाइड है। इसमें 12% प्रोटीन भी होता है।
- बायोफोर्टिफिकेशन के संदर्भ में:
- बायोफोर्टिफिकेशन वह प्रक्रिया है जिसके तहत खाद्य फसलों में पोषक तत्त्वों की सघनता/सांद्रता को पारंपरिक पादप प्रजनन, उन्नत कृषि पद्धतियों और आधुनिक जैव-प्रौद्योगिकी के माध्यम से उपभोक्ताओं द्वारा वांछित किसी भी विशेषता का त्याग किये बिना बढ़ाया जाता है।
- इसे पोषण-संवेदनशील-कृषि हस्तक्षेप के रूप में मान्यता प्राप्त है जो विटामिन और खनिज की कमी को कम कर सकता है।
- बायोफोर्टिफिकेशन परियोजनाओं के उदाहरणों में शामिल हैं:
- चावल, सेम, शकरकंद, कसावा और फलियों का आयरन-बायोफोर्टिफिकेशन;
- गेहूँ, चावल, सेम, शकरकंद और मक्का का ज़िंक-बायोफोर्टिफिकेशन;
- शकरकंद, मक्का और कसावा का प्रो-विटामिन A कैरोटीनॉयड-बायोफोर्टिफिकेशन; और
- ज्वार और कसावा का एमिनो एसिड और प्रोटीन-बायोफोर्टिफिकेशन।
- बायोफोर्टिफिकेशन की आवश्यकता:
- कुपोषण: भारत में महिलाओं और बच्चों में कुपोषण का स्तर बहुत अधिक है। वर्ष 2019-21 NFHS-5 के अनुसार, 15-49 आयु वर्ग की 57% महिलाएँ और 6 से 59 महीने के बीच के 67% बच्चे एनीमिया से पीड़ित हैं। आयरन, विटामिन A और आयोडीन की कमी सबसे आम है।
- बायोफोर्टिफिकेशन पोषक तत्त्वों की कमी को पूरा करके ‘कुपोषण’ और ‘प्रच्छन्न भुखमरी’ की घटनाओं को कम करने में मदद कर सकता है।
- रोग प्रतिरोधक: बायोफोर्टिफाइड फसलें प्रायः कीटों, बीमारियों, उच्च तापमान और अनावृष्टि के प्रति अधिक आघात सह होती हैं, साथ ही इनकी पैदावार भी उच्च होती हैं।
- संधारणीय: एक बार बायोफोर्टिफाइड बीज विकसित हो जाने के बाद, उन्हें सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की सांद्रता खोए बिना पुनरुत्पादित और वितरित किया जा सकता है, जिससे वे लागत प्रभावी एवं संधारणीय बन जाते हैं।
- व्यवहार में कोई बदलाव की आवश्यकता नहीं: यह लोगों की खाद्य आदतों या सांस्कृतिक प्रथाओं में बदलाव किये बिना पोषक तत्त्वों को सहजता से वितरण सुनिश्चित करता है, जिससे यह सामाजिक-सांस्कृतिक रूप से स्वीकार्य उपागम बन जाता है।
- लागत प्रभावी: मौजूदा तकनीक और वितरण प्लेटफॉर्म का उपयोग करके बायोफोर्टिफिकेशन लागत प्रभावी सिद्ध हुआ है। कोपेनहेगन कॉन्सेंसस का अनुमान है कि फोर्टिफिकेशन पर खर्च किये गए प्रत्येक 1 रुपए से अर्थव्यवस्था को 9 रुपए का लाभ होता है।
- कुपोषण: भारत में महिलाओं और बच्चों में कुपोषण का स्तर बहुत अधिक है। वर्ष 2019-21 NFHS-5 के अनुसार, 15-49 आयु वर्ग की 57% महिलाएँ और 6 से 59 महीने के बीच के 67% बच्चे एनीमिया से पीड़ित हैं। आयरन, विटामिन A और आयोडीन की कमी सबसे आम है।