शहरी वित्त और 16वें वित्त आयोग का मुद्दा

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चर्चा में क्यों?

भारत में 16वें वित्त आयोग (Finance Commission- FC) से संबंधित हाल के घटनाक्रमों ने राजकोषीय विकेंद्रीकरण से संबंधित महत्त्वपूर्ण मुद्दों को उजागर किया है, विशेष रूप से शहरी क्षेत्रों और संघीय ढाँचे के भीतर उनकी वित्तीय स्थिरता पर ध्यान केंद्रित किया है।

विश्व बैंक ने अनुमान लगाया है कि अगले दशक में बुनियादी शहरी बुनियादी ढाँचे के लिये 840 बिलियन अमरीकी डॉलर की आवश्यकता होगी।

शहरी क्षेत्रों में वित्तीय स्थिरता संबंधी मुद्दे क्या हैं?

शहरीकरण की चुनौतियाँ: भारत के शहरी क्षेत्र, जो भारत के सकल घरेलू उत्पाद में 66% और कुल सरकारी राजस्व में लगभग 90% का योगदान करते हैं, भारी बुनियादी ढाँचे तथा वित्तीय चुनौतियों का सामना करते हैं।
महत्त्वपूर्ण आर्थिक केंद्र होने के बावजूद, शहरों को अपर्याप्त वित्तीय सहायता प्राप्त होती है तथा अंतर-सरकारी हस्तांतरण सकल घरेलू उत्पाद का केवल 0.5% होता है, जिससे आवश्यक सेवाएँ प्रदान करने और बुनियादी ढाँचे को बनाए रखने की उनकी क्षमता प्रभावित होती है।
वित्तीय हस्तांतरण मुद्दे: शहरी स्थानीय निकायों को धनराशि का हस्तांतरण अन्य विकासशील देशों की तुलना में काफी कम है।
उदाहरण के लिये, दक्षिण अफ्रीका अपने सकल घरेलू उत्पाद का 2.6%, मेक्सिको 1.6%, फिलीपींस 2.5% और ब्राज़ील 5.1% अपने शहरों को आवंटित करता है।
यह कमी शहरी उत्पादकता और जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करती है, जो कि GST की शुरुआत से और भी बदतर हो गई है, जिसने ULB के अपने कर राजस्व को कम कर दिया है।
संसाधनों का दोहन: 221 नगर निगमों (2020-21) के रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया सर्वेक्षण से पता चला है कि इनमें से 70% से अधिक निगमों के राजस्व में गिरावट देखी गई, जबकि इसके विपरीत, उनके व्यय में लगभग 71.2% की वृद्धि हुई।
RBI की रिपोर्ट में संपत्ति कर के सीमित कवरेज और नगर निगम के राजस्व को बढ़ाने में इसकी विफलता पर भी प्रकाश डाला गया है।
आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (OECD) के अनुसार भारत में संपत्ति कर संग्रह दर (GDP अनुपात में संपत्ति कर) दुनिया में सबसे कम है।
अनुदान में कमी: विशेषज्ञों का तर्क है कि GST ने न केवल चुंगी समाप्त कर दी, बल्कि कई छोटे उद्यमियों के कारोबार पर भी बुरा असर पड़ा, जिसके परिणामस्वरूप शहरी स्थानीय निकायों के कर राजस्व में उल्लेखनीय कमी देखी गई।
पहले शहरी केंद्रों के कुल राजस्व व्यय का लगभग 55% चुंगी से पूरा किया जाता था, जो अब काफी कम हो गया है।
अन्य मामले:
जनगणना डेटा संबंधी चिंताएँ: अद्यतन जनगणना आँकड़ों (2011 से) की अनुपस्थिति शहरी आबादी और उसकी आवश्यकताओं का सटीक आकलन करने में चुनौती पेश करती है।
यह पुराना डेटा साक्ष्य-आधारित राजकोषीय हस्तांतरण योजना को प्रभावित करता है, जो कि गतिशील शहरीकरण प्रवृत्तियों, जिसमें टियर-2 और 3 शहरों की ओर प्रवास भी शामिल है, को उजागर करने के लिये महत्त्वपूर्ण है।
नीतिगत विकृतियाँ: समानांतर एजेंसियाँ ​​और योजनाएँ, जैसे कि सांसद/विधायक स्थानीय क्षेत्र विकास निधि, स्थानीय सरकारों की वित्तीय स्वायत्तता को कमज़ोर करती हैं, इच्छित संघीय ढाँचे को विकृत करती हैं और शहरी शासन तथा सेवा वितरण को जटिल बनाती हैं।
कम क्रियात्मक स्वायत्तता: महामारी के दौरान, राष्ट्रीय, राज्य और ज़िला स्तर के नेताओं को आपदा न्यूनीकरण रणनीतियों पर विचार करते देखा गया, हालाँकि नगर निगमों के प्रमुखों को इस समूह में शामिल नहीं किया गया।
स्थानीय सरकारों को राज्य सरकारों के सहायक के रूप में मानने का पुराना दृष्टिकोण नीतिगत प्रतिमान पर हावी बना हुआ है।
संरचनात्मक मुद्दे: कुछ शहरी स्थानीय सरकारों के पास बुनियादी ढाँचे और मानव संसाधन नहीं हैं। जबकि कुछ राज्यों में स्थानीय निकायों के लिये नियमित चुनाव नहीं कराए जाते हैं। इससे उनके कामकाज और सेवाओं की डिलीवरी प्रभावित होती है।

16वें वित्त आयोग के लिये प्रमुख विचारणीय विषय क्या हैं?

परिचय:
भारत में वित्त आयोग भारतीय संविधान के अनुच्छेद 280 के तहत स्थापित एक संवैधानिक निकाय है।
इसका प्राथमिक कार्य केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के बीच वित्तीय संसाधनों के वितरण की सिफारिश करना है।
15वें वित्त आयोग का गठन 27 नवंबर, 2017 को किया गया था। इसने अपनी अंतरिम और अंतिम रिपोर्ट के माध्यम से 1 अप्रैल, 2020 से शुरू होने वाली छह वर्षों की अवधि को कवर करते हुए सिफारिशें कीं।
पंद्रहवें वित्त आयोग की सिफारिशें वित्तीय वर्ष 2025-26 तक मान्य हैं।
संदर्भ की शर्तें:
कर आय का विभाजन: संविधान के अध्याय-I के तहत केंद्र सरकार और राज्यों के बीच करों के वितरण की सिफारिश करना।
इसमें कर आय से राज्यों के बीच शेयरों का आवंटन शामिल है।
सहायता अनुदान के सिद्धांत: भारत की संचित निधि से राज्यों को सहायता अनुदान को नियंत्रित करने वाले सिद्धांतों की स्थापना करना।
इसमें विशेष रूप से संविधान के अनुच्छेद 275 के अंतर्गत राज्यों को सहायता अनुदान के रूप में प्रदान की जाने वाली राशि का निर्धारण करना शामिल है।
स्थानीय निकायों के लिये राज्य निधि को बढ़ाना: राज्य की समेकित निधि को बढ़ाने के उपायों की पहचान करना।
इसका उद्देश्य राज्य के अपने वित्त आयोग द्वारा की गई सिफारिशों के आधार पर, राज्य के भीतर पंचायतों और नगर पालिकाओं के लिये उपलब्ध संसाधनों को पूरक बनाना है।
आपदा प्रबंधन वित्तपोषण का मूल्यांकन: आयोग आपदा प्रबंधन पहल से संबंधित वर्तमान वित्तपोषण संरचनाओं की समीक्षा कर सकता है।
इसमें आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005 के तहत बनाए गए फंड की जाँच करना और सुधार या बदलाव के लिये उपयुक्त सिफारिशें प्रस्तुत करना शामिल है।

असम सरकार ने राज्य वित्त आयोग में नियुक्ति की

 

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