
Add to favoritesनवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (MNRE) ने राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन (NGHM) के तहत भारत की ग्रीन हाइड्रोजन प्रमाणन योजना (GHCI) शुरू की है।
- परिचय: यह पहल ग्रीन हाइड्रोजन (GH) उत्पादन को प्रमाणित करने के साथ इस क्षेत्र में पारदर्शिता एवं बाज़ार की विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के क्रम में उन्नत ढाँचा निर्माण से संबंधित है।
- उद्देश्य: भारत में ग्रीन हाइड्रोजन बाज़ार को बढ़ावा देना, जिससे कार्बन उत्सर्जन में कटौती करने, निर्यात को बढ़ावा देने तथा ऊर्जा-गहन क्षेत्रों को स्वच्छ ईंधन अपनाने के लिये प्रोत्साहित किया जा सके।
- कांडला, पारादीप और तूतीकोरिन जैसे अंतर्राष्ट्रीय बंदरगाह शहरों को निर्यात के क्रम में ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन के मुख्य केंद्र के रूप में चुना गया है।
- इससे ग्रीनवॉशिंग (जिसमें कंपनियाँ झूठे दावे करके खुद को पर्यावरण अनुकूल बताती हैं) पर अंकुश लग सकेगा।
- प्रमाणन प्रक्रिया: अनुपालन सुनिश्चित करने के क्रम में इसे ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (BEE) द्वारा मान्यता प्राप्त कार्बन सत्यापन (ACV) एजेंसी द्वारा सत्यापित किया जाना शामिल है।
- यह प्रमाणपत्र हस्तांतरणीय न होने के साथ इसका व्यापार नहीं किया जा सकता है तथा इसका उपयोग उत्सर्जन कटौती क्रेडिट का दावा करने के लिये भी नहीं किया जा सकता है।
- BEE ने CCTS के तहत ग्रीन हाइड्रोजन का उपयोग करने वाले कुछ विशिष्ट क्षेत्रों (जैसे सीमेंट) के लिये ऑफसेट तंत्र की भी घोषणा की है ताकि उन्हें ऋण अर्जित करने तथा व्यापार करने में सहायता मिल सके।
- प्रयोज्यता: यह प्रमाणन योजना केवल इलेक्ट्रोलिसिस या बायोमास के रूपांतरण से ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन पर लागू है।
HADR अभ्यास में भागीदारी हेतु INS शारदा मालदीव पहुँचा
INS शारदा, मालदीव राष्ट्रीय सुरक्षा बल (MNDF) के साथ संयुक्त मानवीय सहायता एवं आपदा राहत (HADR) अभ्यास हेतु मालदीव के माफिलाफुशी एटाॅल पहुँचा।
- यह अभ्यास हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) से संबंधित भारत के “MAHASAGAR (क्षेत्र में सुरक्षा और विकास के लिये पारस्परिक एवं समग्र उन्नति)” दृष्टिकोण के अनुरूप है।
- इससे पूर्व वर्ष 2004 में हिंद महासागर में आई सुनामी के बाद, भारतीय नौसेना ने अपने HADR ऑपरेशन के भाग के रूप में, संकट के दौरान मालदीव को राहत प्रदान करने के क्रम में ऑपरेशन कैस्टर शुरू किया था।
- HADR अभ्यास का उद्देश्य मानवीय चुनौतियों के संदर्भ में प्रभावी प्रतिक्रिया के क्रम में भारतीय नौसेना तथा MNDF के बीच अंतर-संचालनशीलता को बढ़ावा देना है।
- सुकन्या श्रेणी के गश्ती पोत INS शारदा (P55) को वर्ष 2024 में सोमालिया तट पर अपहृत ईरानी पोत ओमारी से 19 बंधकों को बचाने हेतु ‘ऑन द स्पॉट यूनिट सिटेशन’ से सम्मानित किया गया, जिससे इसकी परिचालन उत्कृष्टता के साथ हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की समुद्री सुरक्षा में इसकी भूमिका पर प्रकाश पड़ता है।
- भारत और मालदीव के बीच अभ्यास: द्विपक्षीय अभ्यासों में “एकुवेरिन (सेना) और “एकाथा (नौसेना)” शामिल हैं जबकि त्रिपक्षीय तट रक्षक अभ्यास “दोस्ती” में श्रीलंका भी शामिल होता है।
एटाॅल: एटाॅल का आशय एक वलय के आकार की मूंगा चट्टान, द्वीप या टापुओं की शृंखला से है। इससे लैगून नामक जल निकाय घिरा रहता है।
वर्ल्ड रेड क्रॉस और रेड क्रिसेंट डे
वर्ल्ड रेड क्रॉस और रेड क्रिसेंट डे प्रत्येक वर्ष 8 मई को मनाया जाता है ताकि पूरे विश्व में लाखों स्वयंसेवकों के मानवीय प्रयासों को सम्मानित किया जा सके।
- थीम 2025: “मानवता को जीवित रखना (Keeping Humanity Alive)” बढ़ती असमानताओं, स्वास्थ्य संकटों और संघर्षों के बीच मानवीय सेवा के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
- ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: यह दिवस वर्ष 1948 में स्थापित किया गया था ताकि हेनरी ड्यूना के जन्म (8 मई 1828) की स्मृति में मनाया जा सके, जो इंटरनेशनल कमेटी ऑफ द रेड क्रॉस (ICRC) के संस्थापक और पहले नोबेल शांति पुरस्कार विजेता थे। उन्होंने यह पुरस्कार फ्रेडरिक पैसी के साथ साझा किया था।
- सैलफ्रीनों के युद्व (1859) की भयावहता को देखने के बाद, हेनरी ड्यूना ने मानवीय सहायता संगठनों की आवश्यकता पर बल दिया, जिसके परिणामस्वरूप वर्ष 1863 में इंटरनेशनल कमेटी ऑफ द रेड क्रॉस (ICRC) की स्थापना हुई और बाद में जिनेवा कन्वेंशन का गठन हुआ।
- इंटरनेशनल रेड क्रॉस और रेड क्रिसेंट मूवमेंट, जिसमें 80 मिलियन से अधिक सदस्य हैं, में ICRC और 191 राष्ट्रीय समितियाँ शामिल हैं। यह संघर्षों और आपदाओं के दौरान सुरक्षा एवं सहायता प्रदान करता है तथा इसे रेड क्रॉस, रेड क्रिसेंट व रेड क्रिस्टल के प्रतीकों द्वारा मान्यता प्राप्त है।
- महत्त्व: यह दिवस मानवता, निष्पक्षता और तटस्थता के सिद्धांतों को बढ़ावा देते हुए आपात स्थितियों, युद्धों एवं आपदाओं में सहायता करने वाले स्वयंसेवकों को सम्मानित करता है।
- इंडियन रेड क्रॉस सोसाइटी (IRCS): इसकी स्थापना वर्ष 1920 में की गई थी। यह आपदा राहत और स्वास्थ्य सेवा प्रदान करती है। भारत के राष्ट्रपति इसके अध्यक्ष होते हैं और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री इसके चेयरमैन होते हैं।
महासागरों में माइक्रोप्लास्टिक इनफिल्ट्रेशन
चर्चा में क्यों?
हाल ही में “नेचर” पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन से पता चला है कि माइक्रोप्लास्टिक केवल सतही प्रदूषक नहीं हैं, बल्कि अब वे समुद्र की गहराइयों में समाहित हो गए हैं, जो पृथ्वी के जैव-रासायनिक और कार्बन चक्रों पर प्रभाव डाल रहे हैं।
अध्ययन के मुख्य निष्कर्ष क्या हैं?
- माइक्रोप्लास्टिक इनफिल्ट्रेशन: माइक्रोप्लास्टिक महासागर में व्यापक रूप से फैले हुए हैं, जो समुद्री पारिस्थितिकी तंत्रों पर हावी हैं और महासागरीय घूर्णनों (Gyres) में 100 मीटर तक की गहराई तक पहुँच चुके हैं।
- जबकि बड़े प्लास्टिक के टुकड़े (100 से 5,000 माइक्रोमीटर) सामान्यतः महासागर की सतह के पास संकेंद्रित होते थे, छोटे कण महासागरीय घूर्णनों में 100 मीटर की गहराई तक समाहित पाए गए।
- घूर्णन (Gyres), धीमे-गति से चलने वाली, वृत्ताकार महासागरीय धाराएँ, प्लास्टिक को फँसाती हैं और संकेंद्रित करती हैं।
- मात्रा: वर्ष 1950 से 2015 तक कुल प्लास्टिक इनपुट का अनुमान 17 से 47 मिलियन मीट्रिक टन के बीच लगाया गया था।
- नायलॉन और पॉलिएस्टर से बना मछली पकड़ने का उपकरण महासागर में घने प्लास्टिक जैसे पॉलीएथिलीन टेरेफ्थेलेट (PET-Polyethylene Terephthalate) का एक प्रमुख स्रोत है, जिसमें 56 से अधिक पॉलिमर प्रकारों का पता चला है।
- प्रभाव: जैव-रासायनिक चक्रण के लिये महत्त्वपूर्ण जल स्तंभ, माइक्रोप्लास्टिक्स से तेज़ी से प्रभावित हो रहा है, जिससे महासागर के कार्बन चक्र में संभावित रूप से व्यवधान उत्पन्न हो रहा है।
- कार्बन चक्र में हस्तक्षेप: प्लास्टिक प्रदूषण समुद्री पारिस्थितिक तंत्र में बाह्य कार्बन (जिसे अलोकथोनस कार्बन (allochthonous carbon) कहा जाता है) जोड़ता है, जबकि माइक्रोप्लास्टिक कार्बन समुंदर के जल में 30 मीटर गहरे स्तर पर कुल कणिकीय कार्बनिक कार्बन (POC) का 0.1% होता है, जो उपोष्णकटिबंधीय गायर में 2,000 मीटर की गहराई पर 5% तक बढ़ जाता है।
- यह समुद्री नमूनों (Marine samples) को 420 वर्ष पुराना दिखा सकता है।
- जैव-रासायनिक प्रभाव: माइक्रोप्लास्टिक्स सूक्ष्मजीवों की नाइट्रीफिकेशन और डिनाइट्रीफिकेशन को बदलते हैं और मेटाबोलाइट्स का उत्सर्जन करते हैं जो पोषक तत्त्वों के चक्र को बाधित करते हैं।
- कार्बन चक्र में हस्तक्षेप: प्लास्टिक प्रदूषण समुद्री पारिस्थितिक तंत्र में बाह्य कार्बन (जिसे अलोकथोनस कार्बन (allochthonous carbon) कहा जाता है) जोड़ता है, जबकि माइक्रोप्लास्टिक कार्बन समुंदर के जल में 30 मीटर गहरे स्तर पर कुल कणिकीय कार्बनिक कार्बन (POC) का 0.1% होता है, जो उपोष्णकटिबंधीय गायर में 2,000 मीटर की गहराई पर 5% तक बढ़ जाता है।
माइक्रोप्लास्टिक क्या हैं?
- परिचय: माइक्रोप्लास्टिक्स, जिन्हें पाँच मिलीमीटर से छोटे व्यास वाले प्लास्टिक के रूप में परिभाषित किया जाता है, महासागरों और जलजीवों के लिये हानिकारक हो सकते हैं।
- सौर यूवी विकिरण, वायु और महासागरीय धाराएँ प्लास्टिक को माइक्रोप्लास्टिक्स (<5 मिमी) और नैनोप्लास्टिक्स (<100 नैनोमीटर) में तोड़ देती हैं।
- वर्गीकरण:
- प्राथमिक माइक्रोप्लास्टिक: वे वाणिज्यिक उपयोग के लिये बनाए गए छोटे कण होते हैं, जैसे माइक्रोबीड्स, प्लास्टिक छर्रे और कपड़ों के माइक्रोफाइबर ।
- द्वितीयक माइक्रोप्लास्टिक: ये तब बनते हैं जब बोतलों जैसे बड़े प्लास्टिक सूर्य के प्रकाश और समुद्री धाराओं के कारण टूट जाते हैं ।
- चिंताएँ: माइक्रोप्लास्टिक लाल रक्त कोशिकाओं से चिपक सकते हैं, जिससे ऑक्सीजन का परिवहन कम हो जाता है और ये प्लेसेंटा व भ्रूण के अंगों में भी पाए गए हैं ।
- ये मानव कोशिकाओं को नुकसान पहुँचा सकते हैं और छोटे बच्चे विशेष रूप से इसके प्रति संवेदनशील होते हैं।
- अनुप्रयोग: इसका उपयोग दवा वितरण, औद्योगिक सफाई तथा स्क्रब और टूथपेस्ट जैसे व्यक्तिगत देखभाल उत्पादों में एक्सफोलियेंट के रूप में किया जाता है।
- माइक्रोप्लास्टिक से संबंधित विनियम: