
Add to favoritesचर्चा में क्यों?
सर्वोच्च न्यायालय ने हल्द्वानी में रेलवे के अवसंरचनात्मक विकास और रेलवे की भूमि पर अवैध रूप से कब्ज़ा करने वाले आरोपियों के लिये आश्रय के मौलिक अधिकार के बीच संतुलन बनाने का आह्वान किया।
न्यायालय ने आगे कहा कि उसके आदेशों की गलत व्याख्या भविष्य में सार्वजनिक भूमि पर अतिक्रमण को बढ़ावा देने के रूप में भी नहीं की जा सकती।
आश्रय का अधिकार क्या है और इसमें शामिल महत्त्वपूर्ण संवैधानिक प्रावधान क्या हैं?
भारत में आश्रय के अधिकार को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 द्वारा गारंटीकृत जीवन के अधिकार के व्यापक दायरे के तहत एक मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता प्राप्त है।
यह अधिकार सुनिश्चित करता है कि प्रत्येक नागरिक को पर्याप्त आवास उपलब्ध हो, जिसे गरिमापूर्ण जीवन जीने के लिये आवश्यक माना जाता है।
इसका तात्पर्य केवल सिर पर छत अर्थात् आश्रय ही नहीं है, बल्कि इसमें पर्याप्त गोपनीयता, स्थान, सुरक्षा, प्रकाश व्यवस्था, वेंटिलेशन, बुनियादी ढाँचा और कार्यस्थलों व सामाजिक सुविधाओं से निकटता भी शामिल है।
उचित पुनर्वास और उचित प्रक्रिया के बिना लोगों का जबरन आश्रय से निष्कासन/बेदखली आश्रय के अधिकार का उल्लंघन करती है।
आश्रय से निष्कासन/बेदखली के संबंध में नैतिक विचार क्या हैं?
मानवाधिकार उल्लंघन: प्रत्येक व्यक्ति को सुरक्षित आवास/आश्रय का अधिकार है और पर्याप्त वैकल्पिक व्यवस्था के बिना बेदखली इस अधिकार को कमज़ोर करती है।
अनुपातहीन प्रभाव: बेदखली से गरीब, दिव्यांग और बुजुर्ग सहित हाशिये पर पड़े समूहों पर असमान रूप से असर पड़ता है, जिनके पास स्थानांतरित होने या पुनर्वास/अनुकूलन के लिये कम संसाधन हो सकते हैं।
विकल्पों का अभाव: कभी-कभी वैकल्पिक आवास समाधान या सहायता सेवाओं की पेशकश किये बिना बेदखली की जाती है, जिससे लोगों के पास पुनर्वासन/अनुकूलन के लिये कोई स्थान नहीं बचता।
आश्रय के अधिकार से संबंधित न्यायिक निर्णय क्या हैं?
ओल्गा टेलिस बनाम बॉम्बे म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन (1985): झुग्गीवासियों ने वैकल्पिक आवास के बिना बेदखली के खिलाफ दलील देते हुए एक जनहित याचिका दायर की। न्यायालय ने माना कि बेदखली आजीविका के अधिकार का उल्लंघन है तथा आजीविका के पर्याप्त साधन सुनिश्चित करना और लोगों को उनके अधिकारों से वंचित न करना राज्य का कर्तव्य है।
महाराष्ट्र राज्य बनाम बसंती भाई खेतान (1986): सर्वोच्च न्यायालय ने भूमि हदबंदी कानून को कायम रखते हुए कहा कि यह मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं करता। हालाँकि, पुनर्वास और पुनर्स्थापन प्रदान करने की ज़िम्मेदारी राज्य की है।
चमेली सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1995): न्यायमूर्ति रामास्वामी ने कहा कि आश्रय का अधिकार अनुच्छेद 21 और निवास का अधिकार [अनुच्छेद 19(1)(e)] के अंर्तगत एक मौलिक अधिकार है।
अहमदाबाद म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन बनाम अहमद सिंह और गुलाब सिंह (1996): ओल्गा टेलिस मामले की तरह, न्यायालय ने फुटपाथ पर रहने वालों को इस शर्त पर बेदखल करने की अनुमति दी कि उन्हें वैकल्पिक आवास उपलब्ध कराया जाएगा।
सुदामा सिंह एवं अन्य बनाम दिल्ली राज्य एवं अन्य (2010): याचिकाकर्त्ताओं ने झुग्गी बस्तियों से पुनर्वास की मांग की थी। दिल्ली उच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि किसी भी बेदखली में पर्याप्त मुआवज़ा या वैकल्पिक आवास शामिल होना चाहिये।
लोगों को आश्रय प्रदान करने के लिये सरकार द्वारा कौन-सी पहलें की गई हैं?
प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY): यह देश के निम्न एवं मध्यम आय वाले निवासियों के लिये किफायती आवास तक पहुँच की सुविधा हेतु भारत सरकार की एक क्रेडिट-लिंक्ड सब्सिडी योजना है।
राष्ट्रीय शहरी आवास कोष (NUHF): यह आवास योजनाओं के कार्यान्वयन के लिये राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों को वित्तीय सहायता प्रदान करता है।
राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन: इसका उद्देश्य गरीब परिवारों को लाभकारी स्वरोज़गार के साथ ही कुशल मज़दूरी के अवसरों तक पहुँच प्रदान करके निर्धनता को कम करना है, जिसके परिणामस्वरूप स्थायी आधार पर उनकी आजीविका में सुधार होगा।
दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन (DAY-NULM): इसका उद्देश्य शहरी बेघर लोगों को आवश्यक सेवाओं से सुसज्जित आश्रय उपलब्ध कराना है।
झोपड़पट्टी पुनर्वास प्राधिकरण (SRA) योजना: विशेष रूप से महाराष्ट्र में सक्रिय यह योजना झुग्गीवासियों के लिये आवास उपलब्धता के साथ उनके पुनर्वास पर केंद्रित है।
भारत में आश्रय के अधिकार का समर्थन करने के लिये कौन-से कानून बनाए गए हैं?
गंदी बस्ती क्षेत्र (सुधार और उन्मूलन) अधिनियम, 1956:
यह सरकार को उन झुग्गी-झोपड़ियों को हटाने का अधिकार देता है जो स्वास्थ्य एवं सुरक्षा जोखिमों के कारण निवास की दृष्टि से अनुपयुक्त हैं।
ऐसे मामलों में अनुपयुक्त आवास को बेहतर, अधिक सतत् संरचनाओं से परिवर्तित करने के लिये पुनर्विकास योजनाएँ तैयार की जाती हैं।
अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वननिवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006:
यह आजीविका के लिये निवास या स्व-कृषि के लिये व्यक्तिगत अथवा साझा अधिग्रहण के तहत वन भूमि पर कब्ज़ा करने और रहने का अधिकार प्रदान करता है।
यह वन समुदायों के वन संसाधनों का उपयोग एवं प्रबंधन करने के अधिकारों को भी मान्यता देता है।
रियल एस्टेट (विनियमन और विकास) अधिनियम, 2016 (RERA):
यह आवासीय परियोजनाओं की पारदर्शिता, जवाबदेहिता तथा समय पर प्रदायगी सुनिश्चित करने के लिये रियल एस्टेट क्षेत्र को नियंत्रित करता है।
यह परियोजनाओं के पंजीकरण को अनिवार्य करके तथा शिकायत निवारण तंत्र प्रकी उपलब्धता द्वारा घर खरीदारों को संरक्षण प्रदान करता है।
भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनर्स्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता अधिकार अधिनियम, 2013:
इसमें भूमि अधिग्रहण से प्रभावित लोगों के पुनर्स्थापन और पुनर्वास के लिये विस्तृत प्रावधान शामिल किये गए हैं।
यह सुनिश्चित करता है कि विस्थापित परिवारों को आवास के साथ-साथ अपने जीवन के पुनर्वासन तथा पुनर्व्यव्स्थापन के लिये सहायता प्राप्त हो।
आदर्श किराएदारी अधिनियम, 2021:
इसका उद्देश्य विवाद समाधान हेतु त्वरित निर्णय तंत्र स्थापित करना, परिसर के किराये को विनियमित करना और मकान मालिकों तथा किरायेदारों के हितों का संरक्षण करना है।
विकास परियोजनाओं और आश्रय के अधिकार के बीच संतुलन कैसे बनाए रखा जा सकता है?
वैकल्पिक आवास समाधान: विकास परियोजनाओं के कारण विस्थापित लोगों के लिये पर्याप्त वैकल्पिक आवास का विकल्प प्रदान करना।
विधिक सुरक्षा और निष्पक्ष प्रक्रियाएँ: यह सुनिश्चित करना कि यदि आवश्यक हो, तो विस्थापन उचित प्रतिकर और सहायता के साथ वैध एवं न्यायपूर्ण विधि से किया जाए।
सामुदायिक विकास और एकीकरण: स्थानीय बुनियादी ढाँचे, सेवाओं और आर्थिक अवसरों को बढ़ाने के लिये परियोजना में सामुदायिक विकास कार्यक्रमों को शामिल करना।
दीर्घकालिक योजना: शहरी नियोजन और आवास के लिये दीर्घकालिक रणनीतियाँ विकसित करना, जो विकास लक्ष्यों को किफायती और सुलभ आवास की आवश्यकता के साथ एकीकृत करती हैं।
निष्कर्ष:
उच्चतम न्यायालय ने आश्रय के अधिकार को जीवन के अधिकार से जोड़ते हुए इसकी मौलिक प्रकृति पर बल दिया है, जबकि संयुक्त राष्ट्र द्वारा इसे मानवाधिकार के रूप में मान्यता दी गई है। राज्य किफायती आवास उपलब्ध कराने की दिशा में कार्य करने के लिये बाध्य है, इसका अर्थ यह नहीं है कि उसे सभी आवासों का निर्माण करना चाहिये या सभी विस्थापनों को रोकना चाहिये। आश्रय का अधिकार, भूमि के अधिकार से पृथक् स्पष्ट जानकारी और यथार्थवादी अपेक्षाओं की आवश्यकता को व्यक्त करता है। इसके मूल तत्त्व को पहचानकर, व्यक्ति अपने अधिकारों का समर्थन कर सकते हैं और आवश्यकता पड़ने पर न्यायिक निवारण की मांग कर सकते हैं।