ग्रेट निकोबार आइलैंड प्रोजेक्ट से संबंधित चिंताएँ

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चर्चा में क्यों?

ग्रेट निकोबार   (GNI) पर प्रस्तावित 80,000 करोड़ रुपए की मेगा बुनियादी ढाँचा परियोजना के संदर्भ में पर्यावरण कार्यकर्त्ताओं ने गंभीर चिंता व्यक्त की है।

  • नीति आयोग की देखरेख में शुरू की गई इस परियोजना में गैलेथिया खाड़ी में एक ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, एक ग्रीनफील्ड हवाई अड्डा, एक ग्रीनफील्ड टाउनशिप और एक गैस-संचालित संयंत्र के साथ एक पर्यटन परियोजना शामिल है।

ग्रेट निकोबार आइलैंड प्रोजेक्ट से संबंधित चिंताएँ:

  • पर्यावरणीय चिंता:
    • वनोन्मूलन: इस परियोजना से लगभग 130 वर्ग किलोमीटर उष्णकटिबंधीय वर्षावन नष्ट होने से जैवविविधता की हानि के साथ पारिस्थितिक असंतुलन को बढ़ावा मिलेगा।
      • पेड़ों की कटाई का प्रारंभिक अनुमान (8.65-9.64 लाख) वास्तविक संख्या से काफी कम पाया गया है, जो संभवतः 10 मिलियन पेड़ों से अधिक हो सकता है।
    • वन्यजीवों पर प्रभाव: इस परियोजना से गैलेथिया खाड़ी वन्यजीव अभयारण्य (WLS) में लेदरबैक समुद्री कछुआ जैसी प्रजातियों को खतरा है।
      • गैलेथिया खाड़ी वन्यजीव अभयारण्य (जिसे वर्ष 1997 में समुद्री कछुआ संरक्षण हेतु नामित किया गया था) को वर्ष 2021 में बंदरगाह के लिये डिनोटिफाइड किया गया, जो भारत की समुद्री कछुआ कार्य योजना (2021) के विपरीत है।
    • प्रतिपूरक वनरोपण मुद्दे: प्राचीन निकोबार वनों की क्षतिपूर्ति, हरियाणा और मध्य प्रदेश में भूमि से की जा रही है, जिससे नष्ट हुई जैवविविधता की भरपाई नहीं हो पाती है।
    • प्रवाल भित्तियों का विनाश: समुद्र तट तटीय विनियमन क्षेत्र (CRZ 1a) के अंतर्गत आता है, जिससे जहाज़ मरम्मत एवं अन्य औद्योगिक गतिविधियाँ समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के लिये खतरा बन जाती हैं।
  • विधिक चिंताएँ:
    • सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का उल्लंघन: सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नियुक्त शेखर सिंह आयोग की 2002 की रिपोर्ट में जनजातीय आरक्षित क्षेत्रों और राष्ट्रीय उद्यानों में वृक्षों की कटाई पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने और कटाई से पहले वनरोपण की सिफारिश की गई थी, लेकिन इस नियम का पालन नहीं किया गया।
    • जनजातीय परामर्श का अभाव: यह परियोजना शोम्पेन जैसे जनजातीय समुदायों के अधिकारों और अस्तित्त्व की उपेक्षा करती है, जिनका अस्तित्त्व इन वनों से गहराई से जुड़ा हुआ है।
    • पारदर्शिता का अभाव: सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए पर्यावरणीय मंजूरी के विवरण को रोक रखा है, लेकिन विशेषज्ञों का तर्क है कि केवल हवाई अड्डे का ही रक्षा संबंध है, संपूर्ण परियोजना का नहीं।
  • सरकार का दृष्टिकोण:
    • विरोधाभासी दृष्टिकोण: गृह मंत्रालय परियोजना के विवरण को रोकने के लिये सुरक्षा चिंताओं का हवाला देता है, जबकि जहाज़रानी मंत्रालय उच्च स्तरीय पर्यटन को बढ़ावा देता है, जिससे रणनीतिक विरोधाभास उत्पन्न होता है।
    • अनियोजित परिवर्द्धन: क्रूज टर्मिनल, जहाज़ निर्माण और EXIM बंदरगाहों जैसे नए परिवर्द्धन पर्यावरण पर अतिरिक्त दबाव उत्पन्न कर सकते हैं।
    • वर्ष 2021 से वर्ष 2024 तक ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल की लागत 20% बढ़ गई। क्रूज़ टर्मिनल और जहाज़-मरम्मत सुविधाओं जैसे नए अतिरिक्त के साथ इसे और बढ़ाने की संभावना है।

नोट: तटीय क्षेत्र प्रबंधन योजना 2019 के तहत उपश्रेणी CRZ 1A में पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील तटीय क्षेत्र शामिल हैं, जैसे जैवविविधता और स्थिरता के लिये महत्त्वपूर्ण प्रवाल भित्तियों की उपस्थिति।

  • शेखर सिंह आयोग की रिपोर्ट (वर्ष 2002) ने अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में विकासात्मक गतिविधियों के पर्यावरणीय और सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभावों का आकलन किया।

 

भारत के लिये ग्रेट निकोबार आइलैंड प्रोजेक्ट का क्या महत्त्व है?

  • सामरिक महत्त्व: मलक्का, सुंडा और लोंबोक जलडमरूमध्य के निकट निकोबार का सामरिक स्थिति भारत को वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिये महत्त्वपूर्ण समुद्री मार्गों की निगरानी करने की अनुमति देता है।
    • यह भारत की एक्ट ईस्ट पाॅलिसी 2014 और क्वाड की हिंद-प्रशांत रणनीति के अनुरूप है, जो क्षेत्रीय सुरक्षा को मज़बूत करता है।
    • एक ग्रीनफील्ड हवाई अड्डा रक्षा तैनाती में तेज़ी लाएगा, जिससे चीनी नौसैनिक गतिविधि पर निगरानी रखने में भारत की क्षमता मज़बूत होगी।
  • आर्थिक महत्त्व: अंतर्राष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल (ICTT) से सिंगापुर और कोलंबो जैसे विदेशी पत्तनों पर भारत की निर्भरता कम होने और भारत को वैश्विक ट्रांसशिपमेंट केंद्र के रूप में स्थापित करने, जहाज़ों और निवेश को आकर्षित करने की उम्मीद है।
  • सतत् विकास: सतत् विकास सुनिश्चित करते हुए इस परियोजना से सिंगापुर और मालदीव जैसे उच्च स्तरीय पर्यटन को बढ़ावा मिल सकता है।
    • एक नया टाउनशिप व्यवसायों को आकर्षित करेगा, बेहतर बुनियादी ढाँचे के साथ जीवन स्तर में सुधार होगा, तथा न्यूनतम पर्यावरणीय प्रभाव के साथ नवीकरणीय ऊर्जा और सतत् आवास को बढ़ावा मिलेगा।

आगे की राह 

  • पारिस्थितिकी क्षति का न्यूनतमीकरण: क्रांतिक पर्यावासों की पहचान करने के उद्देश्य से एक व्यापक जैवविविधता मूल्यांकन का संचालन किये जाने की आवश्यकता है और साथ ही पर्यावरणीय कानूनों का अनुपालन सुनिश्चित करते हुए बुनियादी ढाँचे के विकास के लिये वैकल्पिक अवस्थानों की खोज की जानी चाहिये।
    • पारिस्थितिक संतुलन के अनुरक्षण हेतु अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में क्षीण हो चुके वनों के पुनरुद्धार को प्राथमिकता दिये जाने की आवश्यकता है।
  • जनजातीय अधिकार संरक्षण: शोम्पेन और निकोबारी लोगों के विस्थापन को न्यूनतम करना, उचित मुआवज़ा, आजीविका सहायता और कौशल विकास सुनिश्चित करना तथा समावेशी निर्णय लेने के लिये सामुदायिक परिषद की स्थापना करना।
  • संस्थागत अनुवीक्षण का सुदृढ़ीकरण: अनुपालन और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिये  पर्यावरणविदों, स्थानीय प्रतिनिधियों और अधिकारियों के साथ एक स्वतंत्र निगरानी निकाय का गठन किया जाना चाहिये।
  • संसाधन प्रबंधन: जलवायु-सहिष्णु बुनियादी ढाँचे और आपदा तत्परता का सुदृढ़ीकरण करते हुए सतत् जल, खाद्य और ऊर्जा प्रबंधन विकसित करने की आवश्यकता है।

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