चक्रवात शमन में मैंग्रोव की भूमिका

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चर्चा में क्यों? 

हाल ही में, ओडिशा के भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान और धामरा बंदरगाह के निकट चक्रवात दाना के आने से चक्रवात के प्रभाव को कम करने में मैंग्रोव वनों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रेखांकित हुई।

  • भीतरकनिका के समृद्ध मैंग्रोव वन क्षेत्र के कारण चक्रवात से उतनी क्षति नहीं हुई जितनी कि अनुमान लगाया गया था।
  • भीतरकनिका राष्ट्रीय उद्यान ने अतीत में कई चक्रवातों का सामना किया है, जिनमें अक्तूबर, 1999 में आया सुपर चक्रवात भी शामिल है।

मैंग्रोव क्या हैं? 

  • मैंग्रोव के बारे में: मैंग्रोव लवण- सहिष्णु पेड़ और झाड़ियाँ हैं जो ज्वारनदमुख और अंतर्ज्वारीय क्षेत्रों में पनपते हैं जहाँ मीठा और लवणयुक्त जल एक साथ मिलते हैं।
    • उनमें अद्वितीय अनुकूलन होते हैं, जैसे एरियल रूट्स (हवाई जड़ें) और मोमी पत्तियाँ, जो उन्हें लवणयुक्त पारिस्थितिक तंत्र में जीवित रहने में सक्षम बनाती हैं।
      • वे तटीय वन पारिस्थितिकी तंत्र का प्रतिनिधित्त्व करते हैं, जिसका अर्थ है कि वे तटीय क्षेत्रों में लवणयुक्त जल में पनपते हैं
      • कुछ सामान्य मैंग्रोव वृक्षों में लाल मैंग्रोव, ग्रे-मैंग्रोव और राइज़ोफोरा शामिल हैं।
  • भारत में मैंग्रोव क्षेत्र: भारतीय राज्य वन रिपोर्ट 2021 के अनुसार, भारत में मैंग्रोव क्षेत्र लगभग 4,992 वर्ग किमी है जो देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 0.15% है।
  • भौगोलिक वितरण: भारत के विभिन्न राज्यों में महत्त्वपूर्ण मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र मौज़ूद हैं, जिनमें ओडिशा (भितरकनिका), आंध्र प्रदेश (गोदावरी-कृष्णा डेल्टा), गुजरात, केरल और अंडमान द्वीप समूह शामिल हैं।
    • सुंदरबन (भारत और बांग्लादेश में फैला हुआ) विश्व का सबसे बड़ा सन्निहित मैंग्रोव वन क्षेत्र है। भारत में मैंग्रोव के संदर्भ में सुंदरबन के बाद भितरकनिका दूसरे स्थान पर है।
  • चक्रवात शमन में मैंग्रोव की भूमिका:
    • तटीय सुरक्षा: मैंग्रोव तटीय समुदायों के लिये सुरक्षा की पहली पंक्ति हैं। वे कटाव को धीमा करके तटरेखा को स्थिर करते हैं और तटीय समुदायों के संरक्षण के लिये प्राकृतिक अवरोध प्रदान करते हैं।
    • चक्रवाती लहरों से सुरक्षा: मैंग्रोव वन चक्रवाती लहरों के विरुद्ध प्राकृतिक अवरोधक के रूप में कार्य करते हैं, जिससे लहरों की ऊँचाई, जल प्रवाह वेग में उल्लेखनीय कमी आती है, तथा बाढ़ एवं तटीय क्षति न्यूनतम हो जाती है।
    • बुनियादी ढाँचे के साथ एकीकरण: मैंग्रोव की प्रभावशीलता को निर्मित बुनियादी ढाँचे, जैसे तटबंधों के साथ संयोजित करने पर बढ़ाया जा सकता है।
  • मैंग्रोव की सुरक्षा और संरक्षण के लिये पहल: 
    • MISHTI पहल: केंद्रीय बजट 2023-24 में समुद्र तट के किनारे और लवण भूमि पर मैंग्रोव वृक्षारोपण के लिये MISHTI पहल की घोषणा की गई ।
  • जलवायु के लिये मैंग्रोव गठबंधन: MAC में संयुक्त अरब अमीरात, इंडोनेशिया, भारत, श्रीलंका, ऑस्ट्रेलिया, जापान और स्पेन शामिल हैं । इसका उद्देश्य वैश्विक तापमान वृद्धि को रोकने में मैंग्रोव की भूमिका और जलवायु परिवर्तन के समाधान के रूप में इसकी क्षमता के बारे में विश्व भर में शिक्षा एवं जागरूकता फैलाना है।
    • ब्लू कार्बन पहल: यह तटीय और समुद्री पारिस्थितिकी प्रणालियों के संरक्षण और पुनर्स्थापन के माध्यम से जलवायु परिवर्तन को कम करने पर केंद्रित है।
      • इसका समन्वय कंजर्वेशन इंटरनेशनल (CI), IUCN और अंतर-सरकारी महासागरीय आयोग-यूनेस्को (IOC-UNESCO) द्वारा किया जाता है।

 

मैंग्रोव संरक्षण में क्या चुनौतियाँ हैं?

  • तटीय क्षेत्रों का व्यावसायीकरण: जलीय कृषि, तटीय विकास, चावल और ताड़ के तेल की खेती और औद्योगिक गतिविधियाँ तेज़ी से इन लवण-सहिष्णु वृक्षों और उनके द्वारा समर्थित पारिस्थितिकी तंत्रों का स्थान ले रही हैं।
  • तापमान संबंधी मुद्दे: अल्प समय में दस डिग्री का उतार-चढ़ाव पौधे को नुकसान पहुँचाने के लिये पर्याप्त तनाव है तथा यहाँ तक ​​कि कुछ घंटों का शून्य तापमान भी कुछ मैंग्रोव प्रजातियों को नष्ट कर सकता है।
  • मृदा संबंधी मुद्दे: जहाँ जिस भूमि में मैंग्रोव उगते हैं, उसमें ऑक्सीजन की भारी कमी के कारण पौधों के लिये चुनौती उत्पन्न होती है।
  • प्रदूषण और संदूषण: कृषि अपवाह, औद्योगिक उत्सर्जन और अनुचित अपशिष्ट निपटान से होने वाला प्रदूषण मैंग्रोव आवासों को दूषित करता है।
  • एकीकृत प्रबंधन का अभाव: मैंग्रोव का प्रबंधन अक्सर अलगाव में किया जाता है, जिससे निकटवर्ती पारिस्थितिक तंत्रों, जैसे प्रवाल भित्तियों और समुद्री घास के महत्वपूर्ण अंतर्संबंध को पहचानने में असफलता मिलती है, जो समग्र पर्यावरणीय स्वास्थ्य के लिये आवश्यक है।

भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान:

  • भितरकनिका राष्ट्रीय उद्यान उड़ीसा में 672 किलोमीटर के विशाल क्षेत्र में विस्तृत है।
  • राष्ट्रीय उद्यान मूलतः खाड़ियों और नहरों का एक नेटवर्क है, जो ब्राह्मणी, बैतरणी, धामरा और पातासला नदियों के जल से जलप्लावित है, जिससे एक अद्वितीय पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण होता है।
  • यह लवणीय जल के मगरमच्छों का संप्रजनन स्थल है। भितरकनिका में मगरमच्छ संरक्षण परियोजना 1975 में शुरू की गई थी।
  • गहिरमाथा समुद्र तट, जो पूर्व में अभयारण्य की सीमा बनाता है, ओलिव रिडले समुद्री कछुओं का सबसे बड़ा निवह है।

 

मैंग्रोव के संरक्षण हेतु क्या किया जा सकता है?

  • क्षतिग्रस्त मैंग्रोव क्षेत्रों को पुनर्जीवित करने के लिये सहायप्रदत्त प्राकृतिक पुनर्योजन (ANR) जैसी जैव-पुनर्स्थापन तकनीकों का उपयोग करना, जिससे मूल जैवविविधता को बनाए रखने में मदद मिलेगी।
  • सहायप्रदत्त प्राकृतिक पुनर्योजन (ANR) वृक्षारोपण का एक पूरक समाधान है। इस समाधान में एक सॉफ्ट वन प्रबंधन पद्धति शामिल है जो वन रखरखाव कार्य के माध्यम से मौजूदा वनों को संरक्षित करती है जिसमें वृक्षों के प्राकृतिक प्रजनन चक्र का अनुकरण किया जाता है।
  • मौजूदा मैंग्रोव वनों के संरक्षण और क्षरित क्षेत्रों को बहाल करने के उद्देश्य से नीतियों की सख्त आवश्यकता है। तटीय पारिस्थितिकी तंत्र की आघात-सहनीयता बढ़ाने के लिये सतत् प्रबंधन प्रथाओं को अपनाया जाना चाहिये।
  • मैंग्रोव संरक्षण प्रयासों में स्थानीय समुदायों को शामिल करने से स्वामित्व की भावना को बढ़ावा मिल सकता है और इन पारिस्थितिकी प्रणालियों की स्थिरता सुनिश्चित हो सकती है। मैंग्रोव के लाभों के बारे में शिक्षा एवं जागरूकता कार्यक्रम समुदाय द्वारा संचालित संरक्षण पहलों को बढ़ावा दे सकते हैं।

निष्कर्ष:

चक्रवातों के प्रति भारत की आघात-सहनीयता बढ़ाने और तटीय क्षेत्रों के समुदायों की सुरक्षा के लिये मैंग्रोव संरक्षण प्रयासों को सुदृढ़ करना अनिवार्य है। पारिस्थितिकी और अवसंरचनात्मक उपायों का एकीकरण दीर्घकालिक संधारणीयता और आपदा जोखिम न्यूनीकरण के लिये महत्वपूर्ण होगा।

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