मद्रास राज्य बनाम वी.जी. रो मामला

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चर्चा में क्यों?

मद्रास राज्य बनाम वी.जी. रो, 1952 में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय ने मौलिक अधिकारों को प्रतिबंधित करने वाले कानूनों के लिये तर्कसंगतता की कसौटी स्थापित की।

  • इसने न्यायिक समीक्षा के लिये एक प्रतिमान स्थापित किया तथा यह सुनिश्चित किया कि नागरिक स्वतंत्रता पर प्रतिबंध निष्पक्ष, न्यायसंगत तथा अत्यधिक नहीं होने चाहिये।

मद्रास राज्य बनाम वी.जी. रो मामला क्या है?

  • पृष्ठभूमि: इस मामले में आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम, 1950 को चुनौती दी गई, जिसमें सरकार को सार्वजनिक व्यवस्था के लिये प्रतिकूल समझे जाने वाले संघों को प्रतिबंधित करने का अधिकार दिया, जिसके तहत मद्रास सरकार ने वर्ष 1950 में पीपुल्स एजुकेशन सोसाइटी पर प्रतिबंध लगा दिया।
    • प्रतिबंधित सोसायटी के सदस्य वी.जी. रो ने तर्क दिया कि कानून अनुच्छेद 19(1)(c) (संघ बनाने का अधिकार) का उल्लंघन करता है और अनुच्छेद 19(4) के तहत अनुचित प्रतिबंध लगाता है।
  • सर्वोच्च न्यायालय (SC) का निर्णय:
    • वर्ष 1952 में, सर्वोच्च न्यायालय ने इस कानून को असंवैधानिक करार देते हुए निर्णय दिया कि संघों पर प्रतिबंध लगाने में अत्यधिक कार्यकारी विवेक अनुचित था और अनुच्छेद 19(1)(c) का उल्लंघन करता था।
    • इसमें इस बात पर ज़ोर दिया गया कि प्रतिबंध निष्पक्ष, न्यायसंगत होने चाहिये तथा अपने उद्देश्य के संबंध में अत्यधिक नहीं होने चाहिये।
    • सर्वोच्च न्यायालय ने उल्लंघन किये गए अधिकार की प्रकृति, प्रतिबंध का उद्देश्य और सीमा, संबोधित मुद्दे की आनुपातिकता और मौजूदा सामाजिक-राजनीतिक स्थितियों जैसे कारकों के आधार पर प्रतिबंध की तर्कसंगतता का परीक्षण करने के लिये एक रूपरेखा तैयार की।
  • महत्त्व: 
    • संवैधानिक न्यायशास्त्र का विकास: तर्कसंगतता परीक्षण मूलभूत बन गया, तथा विकसित होकर संरचित आनुपातिकता परीक्षण के रूप में विकसित हुआ, जिसका उपयोग आज मौलिक अधिकारों को सीमित करने वाली राज्य की कार्यवाहियों के मूल्यांकन के लिये किया जाता है।
    • आधुनिक विधिक ढाँचे पर प्रभाव: विधिविरुद्ध क्रिया-कलाप (निवारण) अधिनियम (UAPA), आतंकवादी और विध्वंसक क्रिया-कलाप (निवारण) अधिनियम (TADA), और आतंकवाद निवारण अधिनियम (POTA) जैसे अधिनियमों की इसके तहत जाँच की गई ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि इनसे मनमाना रूप से नागरिक स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं हो।

नोट:

  • अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ, 2020 में, सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय किया कि आवागमन और संचार पर प्रतिबंध आनुपातिकता के परीक्षण पर ही आधारित होना चाहिये
    • सर्वोच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित कि अनिश्चितकालीन इंटरनेट निलंबन अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(g) का उल्लंघन है जब तक कि यह अनुच्छेद 19(2) के तहत न्यायानुमत न हो और यह आवश्यक, आनुपातिक और न्यायिक समीक्षा के अधीन होना चाहिये।
  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 वाक्‌-स्वातंत्र्य, एकत्र होने और संचरण (भ्रमण) सहित मूल अधिकारों की गारंटी देता है।
    • अनुच्छेद 19(2) के अंतर्गत विशिष्ट उद्देश्यों के लिये उचित प्रतिबंधों की अनुमति है: संप्रभुता की रक्षा, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार या सदाचार, न्यायपालिका (न्यायालय की अवमानना) आदि।

अधिकारों और प्रतिबंधों के बीच संतुलन स्थापित करने के ऐतिहासिक मामले कौन-से हैं?

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