
Add to favoritesचर्चा में क्यों?
दक्षिण अफ्रीकी विश्वविद्यालय ने अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के सहयोग से रेडियोधर्मी समस्थानिकों (रेडियोआइसोटोप्स) का उपयोग करके गैंडे के शिकार को रोकने की एक नवाचारी पहल शुरू की है, जिसे राइज़ोटोप प्रोजेक्ट कहा जाता है।
- वर्ष 2025 की IUCN–TRAFFIC रिपोर्ट के अनुसार, भारत में ग्रेटर वन-हॉर्न्ड राइनो (एक-सींग वाला गैंडा) की संख्या 3,323 है और वर्ष 2021 से 2024 के बीच शिकार की 9 घटनाएँ दर्ज की गईं।
राइज़ोटोप प्रोजेक्ट क्या है?
- परिचय: इसमें एक गैर-आक्रामक प्रक्रिया शामिल है, जिसके तहत सजीव गैंडों के सींगों में नियंत्रित मात्रा में रेडियोआइसोटोप प्रविष्ट कराए जाते हैं।
- इससे सींग मानव उपभोग के लिये अनुपयोगी और हानिकारक हो जाते हैं, जबकि यह प्रक्रिया गैंडों के लिये पूरी तरह सुरक्षित रहती है।
- लाभ:
- रेडियोधर्मी उपचारित गैंडे के सींगों की पहचान रेडिएशन पोर्टल मॉनिटर्स (RPM) और सीमा चौकियों, बंदरगाहों व हवाई अड्डों पर स्कैनरों द्वारा की जा सकती है, भले ही वे पूरी तरह भरे कंटेनरों के अंदर हों।
- रेडियोधर्मी मार्कर सींगों को तस्करों के लिये खतरनाक और अवैध व्यापार में कम मूल्यवान बनाते हैं, जिससे शिकार की प्रवृत्ति को हतोत्साहित किया जा सकता है।
रेडियोआइसोटोप क्या हैं?
- परिचय: रेडियोआइसोटोप ऐसे रेडियोधर्मी समस्थानिक होते हैं जिनके परमाणु नाभिक अस्थिर होते हैं और अधिक स्थिर नाभिकीय संरचना प्राप्त करने के लिये आयनकारी विकिरण (अल्फा, बीटा या गामा) उत्सर्जित करते हैं।
- यह नाभिक में न्यूट्रॉन और प्रोटॉन के बीच असंतुलन के कारण होता है। उदाहरण: कार्बन-14 (C-14) और ट्रिटियम (H-3)।
- स्थिरता प्राप्त करने के लिये, ये ऊर्जा और कण उत्सर्जित करते हैं, जिन्हें गाइगर काउंटर या फोटोग्राफिक फिल्म जैसे उपकरणों से पहचाना जा सकता है।
- आइसोटोप: आइसोटोप किसी तत्त्व के ऐसे परमाणु होते हैं जिनका परमाणु क्रमांक (प्रोटॉनों की संख्या) समान होता है, लेकिन द्रव्यमान क्रमांक (प्रोटॉन + न्यूट्रॉन की संख्या) अलग होता है।
- उदाहरण: प्रोटियम, ड्यूटेरियम और ट्रिटियम (हाइड्रोजन के आइसोटोप)।
- अनुप्रयोग:
- चिकित्सा (थायरॉइड निदान के लिये I-131, इमेजिंग के लिये Tc-99m), उद्योग, ऊर्जा उत्पादन, पुरातत्त्व (C-14 डेटिंग)।
गैंडों के लिये प्रमुख खतरे:
- शिकार: यह सबसे गंभीर खतरा बना हुआ है, जिससे संख्या में गिरावट और स्थानीय विलुप्ति हो रही है।
- आक्रामक प्रजातियाँ: इनमें ऐसी प्रजातियाँ (जैसे कि पार्थेनियम) शामिल हैं ,जो आवासों के लिये खतरा बनती हैं, क्योंकि ये गैंडों के मूल भोजन पौधों को प्रतिस्थापित कर देती हैं, जिससे उपलब्ध क्षेत्र सीमित हो जाता है।
- जलवायु परिवर्तन एवं मानव-वन्यजीव संघर्ष: जलवायु परिवर्तन एशिया में मानसून और अनावृष्टि को तीव्र कर देता है, जिससे गैंडे अपने आवास से बाहर निकलने को मजबूर हो जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप वे मानव क्षेत्रों में प्रवेश करते हैं, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ता है।
नोट:
- पार्थेनियम (काॅन्ग्रेस घास) असम के पोबितोरा वन्यजीव अभयारण्य के लिये चुनौती बन रही है, जहाँ विश्व में एक सींग वाले गैंडों का घनत्व सर्वाधिक है। यह घास त्वचा संबंधी एलर्जी, बुखार, कृषि उत्पादकता में कमी और जैवविविधता को नुकसान पहुँचा रही है।
- यह एस्टेरेसी परिवार का एक अत्यधिक आक्रामक पुष्पीय पादप है तथा मूल रूप से अमेरिका का है।
- संभवतः यह 1950 के दशक के आरंभ में अमेरिका से आयातित गेहूँ के साथ भारत में आया और तब से यह देश भर में लगभग 10 लाख हेक्टेयर बंजर भूमि पर आक्रामक रूप से फैल गया है।
गैंडों के संरक्षण की पहल
- एशियाई गैंडों पर नई दिल्ली घोषणा
- सभी गैंडों की DNA प्रोफाइल
- राष्ट्रीय गैंडा संरक्षण रणनीति
- इंडियन राइनो विज़न 2020
अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA)
- IAEA एक अंतर-सरकारी संगठन है जिसकी स्थापना वर्ष 1957 में परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण अनुप्रयोगों को बढ़ावा देने तथा परमाणु हथियारों जैसे सैन्य उद्देश्यों के लिये इसके उपयोग को रोकने के लिये की गई थी।
- इसकी स्थापना संयुक्त राष्ट्र के “शांति के लिये परमाणु” संगठन के रूप में की गई थी और यह अपनी स्वयं की संस्थापक संधि, IAEA के कानून के तहत कार्य करता है।
- यह संयुक्त राष्ट्र महासभा और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद दोनों को रिपोर्ट करता है और इसका मुख्यालय ऑस्ट्रिया के वियना स्थित संयुक्त राष्ट्र कार्यालय में है।
- इसमें 178 सदस्य राष्ट्र शामिल हैं, भारत इसका संस्थापक सदस्य है और इसे परमाणु सुरक्षा और शांति में योगदान के लिये वर्ष 2005 में नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।