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हाल ही में नई दिल्ली में आयोजित एक प्रदर्शनी में 20 विविध कलाकारों ने भाग लिया, जिसमे दक्षिण एशियाई लघु चित्रकारी या मिनिएचर पेंटिंग की उभरती प्रासंगिकता और वैश्विक व्याख्या को प्रदर्शित किया गया तथा इसके गतिशील सांस्कृतिक महत्त्व पर ज़ोर दिया गया।
लघु चित्रकारी या मिनिएचर पेंटिंग क्या हैं?
- के बारे में:
- ‘मिनिएचर’ शब्द लैटिन शब्द ‘मिनियम’ से आया है, जिसका अर्थ है सीसे का लाल रंग, जिसका उपयोग पुनर्जागरणकालीन प्रकाशित पांडुलिपियों में किया गया था।
- ये छोटी, विस्तृत पेंटिंग आमतौर पर 25 वर्ग इंच से बड़ी नहीं होती हैं, तथा विषयों को उनके वास्तविक आकार के 1/6वें हिस्से में चित्रित किया जाता है। आम विशेषताओं में उभरी हुई आँखें, नुकीली नाक और पतली कमर शामिल हैं।
- प्रारंभिक लघुचित्र: प्रारंभिक लघुचित्रों में कम परिष्कृत और कम-से-कम सजावट होती थी। समय के साथ, उनमे अधिक विस्तृत अलंकरण शामिल किये जाने लगे, अंततः वर्तमान के लघुचित्रों के समान हो गए।
- इन्हें अक्सर किताबों या एल्बमों के लिये कागज़, ताड़ के पत्तों और कपड़े जैसी नाशवान सामग्री पर चित्रित किया जाता था। ये पेंटिंग 8वीं और 12वीं शताब्दी के मध्य विकसित हुईं जिसका श्रेय पूर्वी और पश्चिमी क्षेत्रों को दिया जा सकता है। प्रारंभिक लघु चित्रकला के दो प्रमुख रूप (स्कूल) हैं:
- पाल कला (Pala School of Art): यह कला 750-1150 ई. के दौरान विकसित हुआ था। ये चित्र आमतौर पर बौद्ध पांडुलिपियों के एक भाग के रूप में पाए जाते हैं और आमतौर पर ताड़ के पत्ते या चर्मपत्र पर बनाए जाते थे।
- इन चित्रों की विशेषता घुमावदार रेखाएँ और पृष्ठभूमि की छवि की मंद टोन हैं। चित्रों में एकल आकृतियाँ हैं और समूह चित्र शायद ही कभी मिलते हैं।
- बौद्ध धर्म के वज्रयान संप्रदाय के समर्थकों ने भी इन चित्रों का प्रयोग किया तथा इन्हें संरक्षण प्रदान किया।
- अपभ्रंश कला (Apabhramsa School of Art): यह कला गुजरात और मेवाड़, राजस्थान में विकसित हुई, जिसने 11वीं से 15वीं शताब्दी तक पश्चिमी भारतीय चित्रकला पर अपना प्रभुत्व बनाए रखा। शुरुआत में जैन विषयों पर ध्यान केंद्रित करते हुए, बाद में इसमें वैष्णव विषयों को भी शामिल किया गया।
- दिल्ली सल्तनत के दौरान लघुचित्र कला: इन चित्रों ने अपने मूल के फारसी तत्त्वों को भारतीय पारंपरिक तत्त्वों के साथ एक साथ लाने की कोशिश की।
- इसका एक उदाहरण है निमतनामा (Nimatnama), जो मांडू पर शासन करने वाले नासिर शाह के शासनकाल के दौरान बनाई गई एक पाक-कला पुस्तक है।
- मुगलकालीन लघु चित्रकला: मुगल काल में बनाई गई चित्रकलाओं की एक विशिष्ट शैली थी क्योंकि वे फारसी पूर्वजों से ग्रहण की गई थीं।
- मुगल कला को धार्मिक विषयों से परे अपने विविध विषयों के लिये जाना जाता है। देवताओं के चित्रण से हटकर शासकों और उनके जीवन का महिमामंडन करने पर ज़ोर दिया गया। कलाकारों ने शिकार के दृश्यों पर ध्यान केंद्रित किया।
- वे भारतीय चित्रकारों के प्रदर्शन में फॉरशॉर्टनिंग की तकनीक लेकर आए। इस तकनीक के तहत, “वस्तुओं को इस तरह से चित्रित किया जाता था कि वे वास्तव में जितनी छोटी और नज़दीक होती हैं, उससे कहीं ज़्यादा छोटी दिखाई देती हैं”।
- मुगल शासकों का योगदान:
- अकबर: एक आर्टिस्टिक स्टूडियो (Artistic Studio), तस्वीर खाना की स्थापना की और सुलेख को बढ़ावा दिया।
- जहाँगीर: मुगल चित्रकला अपने चरम पर थी, जिसमें प्राकृतिक विषय-वस्तु (वनस्पति और जीव) और सजावटी हाशिये को प्राथमिकता दी गई। उदाहरण: ज़ेबरा और कोक पेंटिंग।
- शाहजहाँ: यूरोपीय कला से प्रेरित होकर, इसमें स्थिरता और पेंसिल रेखाचित्रण को शामिल किया गया तथा अधिक सोने, चांदी और चमकीले रंगों का प्रयोग किया गया।
- दक्षिण भारत में लघुचित्र:
- तंजौर चित्रकला: यह सजावटी चित्रकला के लिये प्रसिद्ध है। 18वीं शताब्दी के दौरान मराठा शासकों द्वारा इन्हें संरक्षण प्रदान किया गया था।
- मैसूर पेंटिंग: मैसूर पेंटिंग में हिंदू देवी-देवताओं को दर्शाया जाता है। इनमें कई आकृतियाँ होती हैं, जिनमें से आकृति आकार और रंग में प्रमुख होती है।
- क्षेत्रीय कला स्कूल:
- राजस्थानी चित्रकला शैली:
- मेवाड़ चित्रकला शैली: मेवाड़ चित्रकला में साहिबदीन की असाधारण छवि पर आधारित है।
- किशनगढ़ चित्रकला स्कूल: चित्रकलाएँ सबसे रोमांटिक किंवदंतियों- सावंत सिंह और उनकी प्रेमिका बानी थनी, और जीवन एवं मिथकों, रोमांस व भक्ति के अंतर्संबंध से संबंधित थीं।
- पहाड़ी चित्रकला शैलियाँ: चित्रकला की यह शैली उप-हिमालयी राज्यों में विकसित हुई: जम्मू या डोगरा कला (उत्तरी शृंखला) और बशोली और कांगड़ा कला (दक्षिणी शृंखला)।
- राजस्थानी चित्रकला शैली:
- आधुनिक चित्रकला: औपनिवेशिक काल के दौरान, कंपनी चित्रकला का उदय हुआ, जिसमें राजपूत, मुगल और भारतीय शैलियों को यूरोपीय तत्त्वों के साथ मिश्रित किया गया। ब्रिटिश अधिकारियों ने भारतीय प्रशिक्षित चित्रकारों को नियुक्त किया, जिसमें यूरोपीय कला को भारतीय तकनीकों के साथ मिलाया गया।
- बाज़ार चित्रकला: यह कला भी भारत में यूरोपीय मुठभेड़ से प्रभावित थी। वे कंपनी चित्रकला से अलग थे क्योंकि उस कला में भारतीय लोगों के साथ यूरोपीय तकनीकों और विषयों को शामिल किया गया था।
- कला की बंगाल शैली : इस शैली का 1940-1960 के दशक में चित्रकला की मौजूदा शैलियों के प्रति प्रतिक्रियावादी दृष्टिकोण था। उन्होंने सामान्य रंगों का उपयोग किया।
- चित्रकला की क्यूबिस्ट शैली: यूरोपीय क्यूबिज्म से प्रेरित, जिसमें वस्तुओं को तोड़ा जाता था, उनका विश्लेषण किया जाता था तथा रेखाओं एवं रंग के प्रयोग को संतुलित करते हुए अमूर्त रूपों का उपयोग करके उन्हें पुनः जोड़ा जाता था।
लघु चित्रकारी को पुनर्जीवित करने के सामाजिक-आर्थिक प्रभाव क्या हैं?
- आर्थिक अवसर: लघु चित्रकला में रुचि के पुनरुत्थान से कलाकारों और कारीगरों के लिये रोज़गार के अवसर उत्पन्न होते हैं, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को योगदान मिलता है।
- कला प्रदर्शनियों से कलाकृतियों के विक्रय को बढ़ावा मिलता है, जिससे भाग लेने वाले कलाकारों की आय में वृद्धि होती है।
- सांस्कृतिक पर्यटन: लघु चित्रकलाएं सांस्कृतिक विरासत में रुचि रखने वाले पर्यटकों को आकर्षित करती हैं, जिससे पर्यटन संबंधी राजस्व में वृद्धि होती है।
- राजस्थान जैसे समृद्ध लघु कला परम्परा वाले क्षेत्र, स्थानीय शिल्प को बढ़ावा देने के लिये पर्यटकों के अवसरों का लाभ उठा सकते हैं।
- सामुदायिक सहभागिता: कार्यशालाएँ और प्रदर्शनियाँ पारंपरिक कलाओं के बारे में सामुदायिक सहभागिता और जागरूकता को बढ़ावा देती हैं।
- शैक्षिक कार्यक्रम युवा पीढ़ी को इन पारंपरिक कौशलों में निपुणता प्राप्त करने और उन्हें बनाए रखने के लिये ज्ञान और तकनीक से समृद्ध कर सकते हैं।
चित्रकला उस समय की सांस्कृतिक पहचान को किस प्रकार प्रतिबिम्बित करती है?
- ऐतिहासिक संदर्भ: लघु चित्रकला के मूल मुगल, राजपूत और फारसी परंपराओं में हैं, जो 16 वीं और 17 वीं शताब्दियों के बीच विकसित हुई।
- इसने कहानी वर्णन के माध्यम के रूप में कार्य किया तथा पवित्र एवं धर्मनिरपेक्ष दोनों प्रकार की कहानियों को जटिल विवरणों के साथ प्रस्तुत किया।
- क्षेत्रीय विविधता: भारत की विविध चित्रकला शैलियाँ स्थानीय सामाजिक-धार्मिक दृष्टिकोण को प्रतिबिंबित करती हैं।
- उदाहरण: अपभ्रंश कला शैली में जैन एवं वैष्णव संबंधी विषयों का चित्रण किया गया है।
- सार्वजनिक पहल: ‘घर-घर म्यूजियम’ जैसी परियोजनाएँ सामुदायिक संग्रहालयों को प्रोत्साहित करके, पारंपरिक कला रूपों को बनाए रखकर तथा सांस्कृतिक पहचान एवं गौरव को बढ़ावा देकर स्थानीय कला को संरक्षित करती हैं।
- समकालीन व्याख्याएँ: आज कलाकार आधुनिक दृष्टिकोण से पारंपरिक विषयों की पुनर्व्याख्या करते हैं, तथा पहचान, आध्यात्मिकता और सामाजिक-राजनीतिक टिप्पणी जैसे समकालीन मुद्दों को संबोधित करते हैं।
- सामाजिक टिप्पणी: चित्रकलाएँ लैंगिक भूमिकाओं, जातिगत भेदभाव और राजनीतिक अशांति जैसे महत्त्वपूर्ण सामाजिक मुद्दों का सामना करती हैं।
- भारत माता की अपनी पेंटिंग के लिये प्रसिद्ध अवनींद्र नाथ टैगोर (कला की बंगाल शैली) जैसे दूरदर्शी लोगों ने पश्चिमी प्रभावों का विरोध करते हुए स्वदेशी कला शैलियों के पुनरुत्थान का समर्थन किया।
- सांस्कृतिक संरक्षण बनाम नवाचार: पारंपरिक तकनीकों को संरक्षित करते हुए, समकालीन कलाकार नए रूपांकनों और माध्यमों (जैसे, डिजिटल कला) के साथ प्रयोग करते हैं।
- यह दोहरा दृष्टिकोण यह सुनिश्चित करता है कि लघु चित्रकला आज के कला परिदृश्य में जीवंत और प्रासंगिक बनी रहे।
कौन सी कार्यान्वयन योग्य रणनीतियाँ लघु चित्रकला के विकास में सहायक हो सकती हैं?
- सरकारी सहायता: कलाकारों को वित्तीय सहायता देने के लिये अनुदान और सब्सिडी देने वाली नीतियों को लागू किया जाना चाहिये। समर्पित कला निधि बनाने से लघु चित्रकला के लिये अनुसंधान, प्रशिक्षण और प्रदर्शनियों को बढ़ावा मिल सकता है।
- शैक्षिक पहल: स्कूल के पाठ्यक्रम में लघु चित्रकला को शामिल करने से युवाओं में कला के प्रति रुचि पैदा हो सकती है। कला संस्थानों के साथ सहयोग करके पारंपरिक और समकालीन तकनीकों को मिलाकर प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जा सकते हैं।
- साहित्य अकादमी क्षेत्रीय कला को बढ़ावा देने, कलाकारों के कौशल को बढ़ाने और प्रदर्शित करने के लिये देश भर में कार्यशालाएँ आयोजित करती है।
- अंतर्राष्ट्रीय सहयोग: अंतर्राष्ट्रीय कला दीर्घाओं और वैश्विक कला मेलों के साथ साझेदारी भारतीय कलाकारों को वैश्विक स्तर पर अपना काम प्रदर्शित करने के लिये मंच प्रदान कर सकती है।
- डिजिटल प्लेटफॉर्म: कलाकृतियों के मुद्रीकरण के लिये ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का उपयोग करने से स्थानीय सीमाओं से परे बाज़ार पहुँच का विस्तार कर सकता है।
- सोशल मीडिया अभियान लघु चित्रकला के महत्त्व के बारे में जागरूकता बढ़ा सकते हैं और व्यापक दर्शकों को आकर्षित कर सकते हैं।