
Add to favoritesचर्चा में क्यों?
विश्व बैंक की रिपोर्ट, जिसका शीर्षक है, “बिकमिंग ए हाई इनकम इकॉनमी इन ए जनरेशन (Becoming a High-Income Economy in a Generation)” में इस बात पर प्रकाश डाला गया है कि भारत को वर्ष 2047 तक उच्च आय वाले देश (HIC) का दर्जा प्राप्त करने के लिये अगले 22 वर्षों में 7.8% की औसत वार्षिक वृद्धि दर हासिल करनी होगी।
- रिपोर्ट में इस बात पर बल दिया गया है कि इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिये महत्त्वाकांक्षी सुधार और उनका प्रभावी कार्यान्वयन आवश्यक होगा।
उच्च आय अर्थव्यवस्था बनने पर रिपोर्ट की मुख्य बिंदु क्या हैं?
- भारत की आर्थिक यात्रा: वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की हिस्सेदारी 2000 में 1.6% से बढ़कर वर्ष 2023 में 3.4% हो गई है, जिससे यह विश्व की 5वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगी।
- महामारी से पहले दो दशकों तक, भारत की अर्थव्यवस्था 6.7% की औसत वार्षिक दर से बढ़ी, जो प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में चीन के बाद दूसरे स्थान पर थी।
- वर्ष 2047 उच्च आय अर्थव्यवस्था लक्ष्य: भारत वर्ष 2047 तक उच्च आय अर्थव्यवस्था बनने की आकांक्षा रखता है।
- इसे प्राप्त करने के लिये, प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय (GNI) को वर्ष 2023 में 2,540 अमेरिकी डॉलर से लगभग 8 गुना बढ़ाना होगा (वर्तमान में भारत निम्न-मध्यम आय वर्ग में है)।
- वर्ष 2023 में, विश्व बैंक ने 14,005 अमेरिकी डॉलर से अधिक प्रति व्यक्ति GNI वाले देशों को उच्च आय के रूप में तथा 4,516-14,005 अमेरिकी डॉलर के बीच प्रति व्यक्ति GNI वाले देशों को उच्च मध्यम आय के रूप में वर्गीकृत किया है।
- विकास परिदृश्य: रिपोर्ट में भारत के विकास पथ के लिये तीन संभावित परिदृश्यों की रूपरेखा दी गई है।
| परिदृश्य | विकास दर (वास्तविक GDP) | निष्कर्ष |
| सुधार में धीमापन | 6% से नीचे | भारत उच्च-मध्यम आय वाला देश बने रहने के साथ HIC से पीछे है। |
| हमेशा की तरह व्यापार | 6.60% | भारत में सुधार तो हुआ है लेकिन यह उच्च आय की स्थिति तक नहीं पहुँच पाया है। |
| त्वरित सुधार | 7.80% | भारत वर्ष 2047 तक उच्च आय वाला देश बन जाएगा। |
- हालाँकि, केवल कुछ ही देश (चिली, रोमानिया, पोलैंड, चेक गणराज्य और स्लोवाकिया) 20 वर्षों के अंदर उच्च आय की स्थिति में परिवर्तित हो पाए हैं जबकि ब्राज़ील, मैक्सिको और तुर्की जैसे देश उच्च-मध्यम आय श्रेणी में ही बने हुए हैं, जिससे यह एक महत्त्वाकांक्षी लेकिन प्राप्त करने योग्य लक्ष्य बन गया है।
HIC दर्जा प्राप्त करने में प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?
- घटती निवेश दर: निवेश-सकल घरेलू उत्पाद (GDP) वर्ष 2008 में 35.8% के उच्चतम स्तर पर पहुँच गया, लेकिन वर्ष 2024 में घटकर 27.5% रह गया।
- FDI चुनौतियाँ: भारत का FDI-GDP अनुपात केवल 1.6% है, जो वियतनाम (5%) और चीन (3.1%) से काफी कम है।
- श्रम बल भागीदारी में गिरावट: भारत की श्रम बल भागीदारी दर (LFPR) वर्ष 2023 में 55% है, जो अधिकांश उभरती अर्थव्यवस्थाओं (चीन वर्ष 2023 में 65.8%) की तुलना में कम है।
- कार्यबल में महिलाएँ: महिला श्रम बल भागीदारी (FLFP) वर्ष 2023-24 में सुधरकर 41.7% हो गई है (वैश्विक बेंचमार्क 50% से अधिक है)।
- रोज़गार सृजन में समस्याएँ: भारत का 45% कार्यबल अभी भी कृषि (प्रच्छन बेरोज़गारी) में संलग्न है, जो कम उत्पादकता वाला क्षेत्र है।
- इसके विपरीत, कुल रोज़गार में विनिर्माण का हिस्सा लगभग 11% था और आधुनिक बाज़ार सेवाओं का हिस्सा केवल 7% था, जो पूर्वी एशियाई अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में बहुत कम है।
- वर्ष 2023-24 में, भारत का 73% कार्यबल अनौपचारिक क्षेत्रों में होगा, जबकि अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं में यह आँकड़ा केवल 32.7% है।
- व्यापार खुलेपन में गिरावट: भारत का निर्यात और आयात सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 46% (वर्ष 2023) है, जो वर्ष 2012 में 56% था।
- निम्न वैश्विक मूल्य शृंखला (GVC) भागीदारी: भारत ने मोबाइल फोन निर्यात में महत्त्वपूर्ण लाभ अर्जित किया है, लेकिन उच्च टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाएँ व्यापक व्यापार विस्तार को सीमित कर रही हैं।
- भारत का सेवा क्षेत्र (IT और BPO) मज़बूत है, लेकिन विनिर्माण क्षेत्र पिछड़ गया है।
HIC का दर्जा प्राप्त करने के लिये किन प्रमुख सुधारों की आवश्यकता है?
- निवेश को बढ़ावा देना: वर्ष 2035 तक निवेश दर को सकल घरेलू उत्पाद के 33.5% से बढ़ाकर 40% करना। बेहतर ऋण प्रवाह के लिये वित्तीय क्षेत्र के विनियमन को मज़बूत करना। सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) की औपचारिक ऋण तक पहुँच में सुधार करना।
- दिवालियापन समाधान और अशोध्य ऋण वसूली के लिये तंत्र को मज़बूत करना।
- अधिक एवं बेहतर नौकरियाँ सृजित करना: वियतनाम (73%) और फिलीपींस (60%) जैसी अर्थव्यवस्थाओं के समकक्ष श्रम बल भागीदारी बढ़ाना।
- कृषि प्रसंस्करण, आतिथ्य, परिवहन और केयर इकोनोमी जैसे रोज़गार-समृद्ध क्षेत्रों में निजी क्षेत्र के निवेश को प्रोत्साहित करना।
- कुशल कार्यबल का विस्तार करना और वित्त तक पहुँच में सुधार करना। आधुनिक विनिर्माण और उच्च मूल्य सेवाओं को मज़बूत करना।
- वैश्विक व्यापार प्रतिस्पर्द्धात्मकता को बढ़ावा देना: निर्यातोन्मुख क्षेत्रों में निवेश करना और GVC में एकीकृत करना।
- कार्यबल को औपचारिक बनाना: अनौपचारिक रोज़गार को कम करने और बेहतर मज़दूरी स्थितियों को बढ़ावा देने के लिये श्रम कानूनों का सरलीकरण।
- मानव पूंजी और नवाचार को मज़बूत करना: उद्योग की आवश्यकताओं के अनुरूप माध्यमिक विद्यालय में नामांकन और व्यावसायिक प्रशिक्षण को बढ़ाना।
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जैव प्रौद्योगिकी और स्वच्छ ऊर्जा जैसे प्रमुख क्षेत्रों में अनुसंधान एवं विकास निवेश का विस्तार करना।
मिडिल इनकम ट्रैप
- परिचय: विश्व बैंक (वर्ष 2007) द्वारा गढ़ा गया मिडिल इनकम ट्रैप उन अर्थव्यवस्थाओं को संदर्भित करता है जो तेज़ी से बढ़ती हैं लेकिन उच्च आय की स्थिति तक पहुँचने में विफल रहती हैं। यह उन देशों पर लागू होता है जिनकी प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय 1,000 से 12,000 अमेरिकी डॉलर (वर्ष 2011 की कीमतों) के बीच है।
- मिडिल इनकम ट्रैप में फंसे देशों को बढ़ती श्रम लागत, कमज़ोर नवाचार, आय असमानता, जनसांख्यिकीय चुनौतियों और विशिष्ट उद्योगों पर अत्यधिक निर्भरता से जूझना पड़ता है, जिससे विकास में बाधा उत्पन्न होती है।
- भारत के ट्रैप में फंसने का जोखिम: भारत विश्व के सबसे असमान देशों में से एक है, जहाँ शीर्ष 10% आबादी के पास कुल राष्ट्रीय आय का 57% हिस्सा है। शेष 50% लोगों का हिस्सा घटकर 13% रह गया है।
- उच्च GST और कॉर्पोरेट कर में कटौती से धनी लोगों को लाभ होता है, जिससे यह अंतर और बढ़ जाता है।
- भारत में स्थिर या घटती मज़दूरी, मुद्रास्फीति, उच्च घरेलू ऋण और कम बचत के साथ मिलकर, देश को मिडिल इनकम ट्रैप के दुष्चक्र हेतु असुरक्षित बना दिया है।