
Add to favoritesभारत की कृषि नीति लंबे समय से इस धारणा पर कार्य करती रही है कि बुनियादी ढाँचे-आधारित विकास—विशेष रूप से बड़े और लंबे समय में पूरे होने वाले सिंचाई परियोजनाओं के जरिये, कृषि पद्धतियों में बदलाव लाया जा सकता है। हालाँकि, हाल के ज़मीनी स्तर के साक्ष्य दिखाते हैं कि किसान फसल चक्र, सिंचाई और आदानों के उपयोग जैसे निर्णय तात्कालिक जरूरतों, जलवायु परिवर्तनशीलता और स्थानीय संसाधनों के आधार पर लेते हैं। इससे टॉप-टू-डाउन योजना और जमीनी स्तर के अनुकूलनशील निर्णय-निर्माण के बीच एक अंतर सामने आता है। एक अधिक समुत्थानशील और समावेशी कृषि प्रणाली बनाने के लिये, भारत को रीयल-टाइम सहायता, विकेंद्रीकृत योजना और ऐसे समुत्थानशील नीतिगत उपायों पर ध्यान देना होगा जो कृषि चक्र और जोखिमों के साथ तालमेल बिठा सकें।
भारत में कृषि सुधारों को आगे बढ़ाने वाले प्रमुख कारक क्या हैं?
- तकनीकी उन्नति और डिजिटल कृषि: AI, GIS, ड्रोन और रिमोट सेंसिंग जैसी डिजिटल कृषि प्रौद्योगिकियों में उन्नति उत्पादकता, संसाधन प्रबंधन और बाज़ार पहुँच में सुधार करके इस क्षेत्र में क्रांति ला रही है।
- ये प्रौद्योगिकियाँ परिशुद्ध खेती को संभव बनाती हैं, जिससे लागत कम होती है और उत्पादन की गुणवत्ता बढ़ती है।
- कृषि में राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस योजना (NEGP-A) का शुभारंभ और डिजिटल कृषि मिशन जैसी पहल तकनीक अपनाने में सहायता कर रही हैं।
- इसके अतिरिक्त, कृषि प्रौद्योगिकी निवेश में वृद्धि, जिसके वर्ष 2025 तक 30-35 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है, बढ़ती हुई प्रौद्योगिकी-संचालित कृषि पारिस्थितिकी तंत्र को दर्शाती है।
- जलवायु समुत्थानशील और जल प्रबंधन: जलवायु परिवर्तन के प्रति भारत की बढ़ती संवेदनशीलता के मद्देनजर जलवायु-अनुकूल फसलों और जल-कुशल सिंचाई प्रणालियों पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है।
- प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के अंतर्गत प्रति बूंद अधिक फसल पहल, जो 95 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र को कवर करती है, सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों को बढ़ावा देती है तथा जल उपयोग दक्षता को बढ़ाती है।
- वर्ष 2015-2021 के बीच सिंचाई तीव्रता 144.2% से बढ़कर 154.5% हो गई है, यह फोकस सतत् विकास के लिये महत्त्वपूर्ण है।
- वित्त वर्ष 2025 में इस पहल के तहत राज्यों को 21,968 करोड़ रुपए आवंटित किये गए हैं, जिससे महत्त्वपूर्ण जल संरक्षण सुनिश्चित हुआ है।
- उच्च मूल्य वाली फसलों और संबद्ध क्षेत्रों में विविधीकरण: बागवानी, पशुधन और मत्स्य पालन की ओर विविधीकरण ने कृषि विकास को पर्याप्त गति प्रदान की है, क्योंकि इन उत्पादों की मांग घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ी है।
- वित्त वर्ष 2013 से वित्त वर्ष 2023 तक 13.67% की सीएजीआर के साथ मत्स्य पालन ऐसे विविधीकरण की सफलता को दर्शाता है।
- प्रधानमंत्री मत्स्य सम्पदा योजना (6,000 करोड़ रुपये का लक्ष्य) जैसी योजनाओं के माध्यम से संबद्ध क्षेत्रों में सरकार के निवेश ने इन क्षेत्रों के किसानों को सशक्त बनाया है।
- वित्त वर्ष 2024 में भारत का समुद्री खाद्य निर्यात 29.7% बढ़कर 60,523 करोड़ रुपए हो गया, जो इस क्षेत्र की बढ़ती वैश्विक उपस्थिति को दर्शाता है।
- ऋण और वित्तीय सहायता तक बेहतर पहुँच: किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) जैसी योजनाओं के कारण संस्थागत ऋण तक पहुँच में काफी सुधार हुआ है, जो किसानों को इनपुट और परिचालन के लिये समय पर वित्तीय सहायता प्राप्त करने में सहायता करता है।
- वित्त वर्ष 22 में कृषि क्षेत्र को संस्थागत ऋण के रूप में 18.6 लाख करोड़ रुपए मंजूर किए गए, जिससे किसानों की वित्तीय क्षमता में वृद्धि हुई।
- पीएम-किसान योजना ने भी किसानों को प्रत्यक्ष रूप से 3.7 लाख करोड़ रुपए वितरित किये हैं, जिससे वित्तीय सहायता संरचना मज़बूत हुई है।
- ऐसे उपाय वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देते हैं, जिससे किसानों को उत्पादकता बढ़ाने के लिये बेहतर प्रौद्योगिकियों और पद्धतियों को अपनाने में मदद मिलती है।
- बुनियादी ढाँचे का विकास और भंडारण क्षमता: कृषि बुनियादी ढाँचे का विकास, विशेष रूप से भंडारण और परिवहन में, फसल-उपरांत नुकसान को कम करने और किसानों के लिये बेहतर बाज़ार पहुँच सुनिश्चित करने के लिये महत्त्वपूर्ण है।
- कृषि अवसंरचना कोष (AIF) ने अवसंरचना परियोजनाओं को समर्थन देने के लिये ₹10,000 करोड़ के ऋण को मंजूरी दी है।
- वित्त वर्ष 2025 में भारत का कुल खाद्यान्न उत्पादन 347.44 मिलियन टन तक पहुँचने की उम्मीद है, जो बुनियादी ढाँचे में निवेश के सकारात्मक प्रभाव को दर्शाता है।
- बाज़ार सुधार और डिजिटल प्लेटफॉर्म: ई-राष्ट्रीय कृषि बाज़ार (ई-नाम) की स्थापना किसानों के लिये मूल्य निर्धारण, पारदर्शिता और बाज़ार तक पहुँच में सुधार लाने में महत्त्वपूर्ण रही है।
- 1.74 करोड़ किसानों और 2.39 लाख व्यापारियों की भागीदारी के साथ, ई-नाम ने ग्रामीण उत्पादकों और शहरी बाज़ारों के बीच के अंतर को कम करने में मदद की है।
- एक राष्ट्र, एक राशन कार्ड सुनिश्चित करने के सरकार के कदम से खाद्यान्न वितरण भी सुव्यवस्थित हुआ है और एकीकृत कृषि बाज़ार प्रणाली बनी है।
- ये सुधार बिचौलियों पर निर्भरता को कम करते हैं, किसानों के लिये उचित मूल्य सुनिश्चित करते हैं, जो उनकी आय में सुधार के लिये महत्त्वपूर्ण है।
- सतत् और जैविक खेती: जैविक और सतत् कृषि पद्धतियों की बढ़ती मांग के साथ, सरकार ने किसानों को जैविक खेती की ओर रुख करने के लिये प्रोत्साहन प्रदान किया है।
- भारत का जैविक खाद्य बाज़ार वित्त वर्ष 2022-27 के बीच 25.25% की CAGR से बढ़ने की उम्मीद है।
- राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन (NMSA) जैसी पहल अधिक सतत् कृषि पद्धतियों पर ज़ोर देती हैं।
- इसके अतिरिक्त, भारतीय कदन्न अनुसंधान संस्थान के नेतृत्व में मिलेट क्रांति, भारत को श्री अन्न उत्पादन में वैश्विक नेता के रूप में स्थापित कर रही है।
भारत में कृषि उत्पादकता और स्थिरता में बाधा डालने वाले प्रमुख मुद्दे क्या हैं?
- अपर्याप्त जल प्रबंधन और सिंचाई अवसंरचना: भारत का कृषि क्षेत्र अपर्याप्त जल प्रबंधन और असंगत सिंचाई अवसंरचना के कारण गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है।
- प्रति बूंद अधिक फसल पहल जैसे सरकारी प्रयासों के बावजूद, जल की कमी एक सतत् समस्या बनी हुई है, विशेष रूप से वर्षा पर निर्भर क्षेत्रों में।
- सिंचाई कवरेज सकल फसल क्षेत्र के 49.3% से बढ़कर 55% हो गया है, फिर भी झारखंड जैसे राज्यों में महत्त्वपूर्ण अंतर बना हुआ है।
- जल संसाधनों का यह असमान वितरण कृषि उत्पादकता को प्रभावित (विशेषकर सूखाग्रस्त क्षेत्रों में) करता है।
- जलवायु परिवर्तन और मौसम संबंधी अनिश्चितता: जलवायु परिवर्तन कृषि उत्पादकता को महत्त्वपूर्ण रूप से प्रभावित कर रहा है, अनियमित वर्षा पैटर्न और बढ़ते तापमान से फसल की उत्पादकता को खतरा उत्पन्न हो रहा है।
- किसानों को अप्रत्याशित मौसम की दोहरी चुनौती का सामना करना पड़ता है, जिससे पारंपरिक कृषि पद्धतियाँ कम विश्वसनीय हो जाती हैं।
- वर्तमान में, केवल चरम मौसम की घटनाओं के कारण होने वाली वार्षिक औसत फसल हानि भारत के सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 0.25 प्रतिशत के बराबर है।
- इसका असर चावल जैसी फसलों पर भी पड़ सकता है। उदाहरण के लिये भारत में तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि और वर्षा में 2 मिमी की कमी से चावल की उत्पादकता में 3 से 15% की कमी आ सकती है।
- छोटी भूमि जोत और खंडित कृषि: भारत में छोटी भूमि जोतों का प्रभुत्व अकुशल कृषि पद्धतियों और सीमित पैमाने की अर्थव्यवस्थाओं को जन्म देता है।
- भारत में 96% भूमि जोत सीमांत या छोटी होने के कारण किसानों को उन्नत प्रौद्योगिकी और मशीनीकरण में निवेश करने में कठिनाई होती है।
- जैसे-जैसे भूमि का आकार घटता है, उत्पादन की प्रति इकाई लागत बढ़ती है, जिससे उत्पादकता कम होती जाती है।
- उदाहरण के लिये वर्ष 2047 तक औसत कृषि आकार घटकर 0.6 हेक्टेयर रह जाने की उम्मीद है, जिससे आधुनिक कृषि तकनीकों को लागू करना चुनौतीपूर्ण हो जाएगा।
- आधुनिक प्रौद्योगिकी और नवाचार तक पहुँच का अभाव: उन्नत कृषि प्रौद्योगिकियों की उपलब्धता के बावजूद, उनके दोहन की गति मंद है, विशेष रूप से छोटे किसानों के बीच।
- डिजिटल प्लेटफॉर्म, ड्रोन और AI-संचालित कृषि तकनीकों तक पहुँच में अंतर उत्पादकता में सुधार में बाधा डालता है।
- सरकार के डिजिटल कृषि मिशन ने कई तकनीक आधारित योजनाएँ शुरू की हैं, लेकिन 30% किसान अभी भी ऐसी तकनीकों का उपयोग नहीं कर रहे हैं।
- तकनीक अपनाने की धीमी गति, विशेष रूप से दूरदराज के क्षेत्रों में, उत्पादन बढ़ाने और स्थिरता प्राप्त करने के लिये भारत की कृषि क्षमता को सीमित करती है।
- अकुशल कृषि नीतियाँ और बाज़ार विनियमन: यद्यपि कृषि उत्पादकता को बढ़ावा देने के लिये कई नीतियाँ शुरू की गई हैं, लेकिन उनके कार्यान्वयन में अक्सर सामंजस्य का अभाव रहता है और वे किसानों की स्थानीय आवश्यकताओं को पूरा नहीं करती हैं।
- उदाहरण के लिये न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) प्रणाली, हालाँकि किसानों की आय की रक्षा करने के लिये बनाई गई थी, लेकिन सभी फसलों को इसमें शामिल नहीं किये जाने तथा इसके खराब क्रियान्वयन के कारण इसकी आलोचना की गई है।
- ई-नाम मंच, जिसका उद्देश्य बेहतर मूल्य प्राप्ति सुनिश्चित करना है, अभी तक केवल 1.74 करोड़ किसानों को ही इससे जोड़ा जा सका है, जिससे कई किसान औपचारिक बाज़ार प्रणाली से बाहर रह गए हैं।
- यह खंडित नीति दृष्टिकोण कृषि बाज़ारों के सुचारू संचालन में बाधा डालता है तथा उन्हें अकुशल और अपारदर्शी बनाता है।
- मृदा क्षरण और सीमित सतत् प्रथाएँ: रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग और जैविक प्रथाओं पर अपर्याप्त ध्यान देने के कारण भारत में मृदा की गुणवत्ता में कमी आ रही है।
- 30% से अधिक भारतीय मृदा क्षरित हो जाने के कारण कृषि स्थायित्व खतरे में है, जिसके परिणामस्वरूप फसल की पैदावार में गिरावट आ रही है।
- राष्ट्रीय सतत् कृषि मिशन (NMSA) जैसी योजनाओं के बावजूद, वैज्ञानिकों का अनुमान है कि 5% से भी कम भारतीय किसान सतत् कृषि पद्धतियों को अपना पाए हैं।
- रासायनिक निविष्टियों पर निर्भरता के कारण मृदा क्षरण हो रहा है, जिसके लिये दीर्घावधि मृदा स्वास्थ्य बहाली प्रक्रियाओं में गहन निवेश की आवश्यकता है, साथ ही पर्याप्त धन उपलब्ध नहीं है।
- अपर्याप्त भंडारण और कटाई के बाद का बुनियादी ढाँचा: भारत में कटाई के बाद होने वाली हानि खराब भंडारण और अपर्याप्त बुनियादी ढाँचे के कारण चिंताजनक रूप से अधिक बनी हुई है।
- कुशल शीत भंडारण और परिवहन नेटवर्क के अभाव में, लगभग 40 % खाद्यान्न बर्बाद हो जाता है, जो लगभग 92,000 करोड़ रुपए/वर्ष के बराबर है।
- यह सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 1% के बराबर है जो भारत में खाद्यान्न की बर्बादी के रूप में नष्ट हो जाता है।
- कृषि अवसंरचना कोष (AIF) जैसी योजनाओं के तहत अधिक भंडारण क्षमता बनाने पर सरकार के फोकस से कुछ परिणाम सामने आए हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी काफी कमी है।
- उदाहरण के लिये खरीफ फसल की खरीद 467.9 मिलियन टन (2004-14) से बढ़कर 787.1 मिलियन टन (2015-25) हो गई है, लेकिन अपर्याप्त भंडारण के कारण अभी भी नुकसान हो रहा है।
- कुशल शीत भंडारण और परिवहन नेटवर्क के अभाव में, लगभग 40 % खाद्यान्न बर्बाद हो जाता है, जो लगभग 92,000 करोड़ रुपए/वर्ष के बराबर है।
- ऋण और वित्तीय सहायता तक सीमित पहुँच: हालाँकि किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) और पीएम-किसान जैसी पहलों ने कुछ वित्तीय राहत प्रदान की है, लेकिन समय पर और पर्याप्त ऋण तक पहुँच कई किसानों के लिये बाधा बनी हुई है।
- कई किसान अभी भी ऋण के अनौपचारिक स्रोतों पर निर्भर हैं, जो प्रायः शोषणकारी होते हैं।
- RBI की एक हालिया रिपोर्ट में ग्रामीण भारत में अनौपचारिक वित्त के फलते-फूलते स्वरूप पर प्रकाश डाला गया है, जहाँ 31% ऋण अनौपचारिक माध्यमों से प्राप्त किये जाते हैं।
- कई किसान अभी भी ऋण के अनौपचारिक स्रोतों पर निर्भर हैं, जो प्रायः शोषणकारी होते हैं।