DRDO का 67वाँ स्थापना दिवस

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चर्चा में क्यों? 

हाल ही में 1 जनवरी को रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) का 67वाँ स्थापना दिवस मनाया गया और भारत के मिसाइल मैन, पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम को श्रद्धांजलि अर्पित की गई।

  • इस कार्यक्रम में भारत की रक्षा क्षमताओं के वर्द्धन में DRDO द्वारा की गई महत्त्वपूर्ण प्रगति पर प्रकाश डाला गया।

DRDO से संबंधित मुख्य तथ्य क्या हैं?

  • परिचय: DRDO की स्थापना 1958 में भारतीय सेना के तकनीकी विकास प्रतिष्ठान (TDE), तकनीकी विकास और उत्पादन निदेशालय (DTDP) और रक्षा विज्ञान संगठन (DSO) का संयोजन करके की गई थी।
    • DRDO भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय का अनुसंधान एवं विकास विंग है।
    • आरंभ में DRDO के पास 10 प्रयोगशालाएँ थीं, वर्तमान में यह 41 प्रयोगशालाओं और 5 DRDO युवा वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं (DYSL) का संचालन करता है।
  • सिद्धांत: DRDO का मार्गदर्शक सिद्धांत बलस्य मूलं विज्ञानम् ” (शक्ति विज्ञान में निहित है) है, जो राष्ट्र को शांति और युद्ध दोनों ही स्थिति में मार्गदर्शित करता है।
  • मिशन: इसका मिशन तीनों सेनाओं की आवश्यकताओं के अनुसार भारतीय सशस्त्र बलों को अत्याधुनिक हथियार प्रणालियों और उपकरणों से लैस करते हुए महत्त्वपूर्ण रक्षा प्रौद्योगिकियों तथा प्रणालियों में आत्मनिर्भर होना है।
  • DRDO के प्रौद्योगिकी क्लस्टर: DRDO की व्यापक समीक्षा करने के लिये वर्ष 2007 में डॉ. पी. रामा राव  की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया था।
    • इसके परिणामस्वरूप सात प्रौद्योगिकी डोमेन-आधारित क्लस्टरों का निर्माण हुआ, जिनमें से प्रत्येक की अध्यक्षता एक महानिदेशक करता है।
    • एयरोनॉटिक्स सिस्टम (Aero): यह क्लस्टर अनमैन्ड एरियल व्हीकल (UAV), एयरोस्टेट्स और संबंधित प्रौद्योगिकियों के विकास पर कार्य करता है।
    • मिसाइल और सामरिक प्रणालियाँ (MSS): यह क्लस्टर लंबी और कम दूरी की मिसाइलों सहित मिसाइल प्रणालियों और संबंधित प्रौद्योगिकियों का विकास करता है।
    • नौसेना प्रणाली और सामग्री (NSM): यह क्लस्टर नौसेना प्लेटफार्मों, सोनार प्रणालियों और पनडुब्बी प्रौद्योगिकियों सहित जलस्थ प्रणालियों पर कार्य करता है।
    • माइक्रो इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस (MED) और कम्प्यूटेशनल सिस्टम (CoS): यह क्लस्टर कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रडार, इलेक्ट्रॉनिक्स और साइबर सुरक्षा के रक्षा अनुप्रयोगों पर केंद्रित है।
    • आर्मामेंट एंड कॉम्बैट इंजीनियरिंग सिस्टम (ACE): इसमें आयुध, गोला-बारूद, विस्फोटक और लड़ाकू वाहनों का विकास शामिल है।
    • इलेक्ट्रॉनिक्स और संचार प्रणाली (ECS): यह क्लस्टर सैन्य इलेक्ट्रॉनिक्स, सेंसर, संचार प्रणाली और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रौद्योगिकियों में विशेषज्ञता रखता है।
    • सैनिक सहायता प्रणाली (SSS): यह क्लस्टर सशस्त्र बलों को उन्नत हथियार प्रणालियों से सुसज्जित करने के साथ-साथ कार्मिकों के मनोवैज्ञानिक, शारीरिक और पोषण संबंधी स्वास्थ्य को भी अनुकूलतम बनाने का कार्य करता है।
  • DRDO की प्रमुख उपलब्धियाँ:
    • 2024 में DRDO की उपलब्धियाँ:
    • मिसाइल प्रणालियाँ:
      • हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइल: MICA, अस्त्र मिसाइल
      • सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलें: त्रिशूल, आकाश, बराक 8
      • सतह से सतह पर मार करने वाली मिसाइलें: अग्नि, पृथ्वी, धनुष, शौर्य
      • क्रूज़ मिसाइलें: ब्रह्मोस, निर्भय
    • लड़ाकू विमान: स्वदेशी हल्का लड़ाकू विमान (LCA) तेजस
    • रॉकेट प्रणालियाँ: मल्टी बैरल रॉकेट लांचर पिनाका
    • नौसेना प्रणालियाँ: हम्सा, नागान (सोनार प्रणाली), उशुस (पनडुब्बी सोनार सुइट), मिहिर (हेलीकॉप्टर सोनार प्रणाली)।
    • मुख्य युद्धक टैंक: अर्जुन
    • मानवरहित हवाई प्रणालियाँ (UAS):
      • लक्ष्य: प्रशिक्षण के लिये पुन: प्रयोज्य हवाई लक्ष्य प्रणाली, जिसे भूमि/जहाज से लक्ष्यों के साथ प्रक्षेपित किया जा सकता है।
      • निशांत: स्वायत्त उड़ान और पैराशूट रिकवरी के साथ निगरानी एवं तोपखाने के सुधार हेतु बहु-मिशन UAV।

डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का DRDO में क्या योगदान है?

  • IGMDP में नेतृत्व: डॉ. कलाम ने वर्ष 1983 में शुरू किए गए एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम (IGMDP) के निर्माण एवं कार्यान्वयन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
    • उनके नेतृत्व में पृथ्वी, त्रिशूल, आकाश, नाग एवं अग्नि मिसाइलों का सफल विकास हुआ, जिससे भारत मिसाइल निर्माता देशों के विशिष्ट समूह का सदस्य बन गया तथा उन्हें ‘भारत के मिसाइल मैन’ की उपाधि मिली।
    • डॉ. कलाम के नेतृत्व में, DRDO ने प्रणोदन, नेविगेशन, नियंत्रण प्रणाली तथा वायुगतिकी जैसी मिसाइल प्रौद्योगिकियों में सफलता हासिल की, जिससे स्वदेशी मिसाइल प्रणालियाँ विकसित हुईं एवं विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता कम हुई।
  • एकीकृत निर्देशित मिसाइल विकास कार्यक्रम: IGMDP, वर्ष 1982-1983 में डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के नेतृत्व में भारतीय रक्षा मंत्रालय द्वारा शुरू किया गया एक कार्यक्रम था, जिसका उद्देश्य मिसाइलों की एक विस्तृत शृंखला पर अनुसंधान और विकास करना था।
    • इस कार्यक्रम का प्राथमिक उद्देश्य आयात पर निर्भरता को कम करना तथा प्रणोदन, नौवहन एवं नियंत्रण प्रणालियों जैसे क्षेत्रों में स्वदेशी विशेषज्ञता को बढ़ावा देना था।
    • इस कार्यक्रम के परिणामस्वरूप पृथ्वी, त्रिशूल, आकाश, नाग एवं अग्नि जैसी प्रमुख मिसाइल प्रणालियों का विकास हुआ।
    • IGMDP के तहत कई प्रमुख तकनीकी लाभ मिलने के साथ भारत की रणनीतिक प्रतिरोधक क्षमता में मज़बूती आई। इसके साथ ‘मेक इन इंडिया’ पहल के समन्वय से रक्षा-औद्योगिक आधार के विकास में योगदान मिला।

डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के बारे में मुख्य तथ्य

  • जन्म: डॉ. अवुल पाकिर जैनुलाब्दीन अब्दुल कलाम का जन्म 15 अक्टूबर 1931 को रामेश्वरम, तमिलनाडु में हुआ।
  • राष्ट्रपति: वर्ष 2002 से 2007 तक इन्होंने भारत के 11वें राष्ट्रपति के रूप में पदभार ग्रहण किया।
  • पुरस्कार: पद्म भूषण (1981), पद्म विभूषण (1990) और भारत रत्न (1997)।
  • साहित्यिक कृतियाँ: विंग्स ऑफ फायर, इंडिया 2020 – ए विज़न फॉर द न्यू मिलेनियम, माई जर्नी, इग्नाइटेड माइंड्स
  • योगदान:
    • इसरो: वह भारत के पहले स्वदेशी उपग्रह प्रक्षेपण यान (SLV-III) के परियोजना निदेशक थे।
    • रोहिणी उपग्रह को पृथ्वी की निम्न कक्षा में सफलतापूर्वक प्रक्षेपित (जुलाई 1980) करने में भूमिका निभाई।
    • इसरो के प्रक्षेपण यान कार्यक्रम को विकसित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, विशेष रूप से PSLV (ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपण यान) के संदर्भ में।
    • इसरो में अग्रणी भूमिका निभाने के साथ फाइबरग्लास प्रौद्योगिकी के विकास में अग्रणी भूमिका निभाई।
    • पोखरण-II: परमाणु ऊर्जा विभाग के सहयोग से भारत के परमाणु परीक्षणों का नेतृत्व किया, जिससे भारत एक परमाणु हथियार संपन्न राष्ट्र बना।
    • पोखरण-II: डॉ. कलाम ने वर्ष 1998 में पोखरण-II परमाणु परीक्षण का नेतृत्व किया, जिसमें परमाणु ऊर्जा विभाग का सहयोग प्राप्त था।
    • विज़न 2020: भारत को वर्ष 2020 तक विकासशील से विकसित राष्ट्र में बदलने के लिये एक राष्ट्रीय योजना प्रस्तावित की।
    • कलाम-राजू स्टेंट: हृदय रोग विशेषज्ञ बी. सोमा राजू के साथ मिलकर इन्होंने कोरोनरी हृदय रोग के लिये एक किफायती स्टेंट विकसित करने में भूमिका निभाई।

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